आज की तेज रफ्तार जिंदगी में महिलाओं की प्राथमिकता तेजी से बदल रही है. पढ़ाई, करियर और आर्थिक स्थिरता के बीच मां बनने का फैसला अक्सर टलता जा रहा है, लेकिन शरीर की अपनी एक जैविक घड़ी होती है जो समय के साथ बदलती रहती है. ऐसे में आधुनिक मेडिकल तकनीक ने महिलाओं को एग फ्रीजिंग का एक नया ऑप्शन दिया है. पिछले कुछ सालों में भारत के बड़े शहरों में एग फ्रीजिंग की तकनीक को लेकर रुचि तेजी से बढ़ी है और अब ज्यादा महिलाएं इसे अपने लगी है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि एग फ्रीजिंग का क्रेज तेजी से कैसे बढ़ रहा है और यह तरीका कितना दर्दनाक होता है. एग फ्रीजिंग, जिसे मेडिकल भाषा में ओओसाइट क्रायोप्रिजर्वेशन कहा जाता है. यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें महिला के अंडों को निकालकर बहुत कम तापमान पर सुरक्षित रखा जाता है. बाद में जब महिला मां बनने के लिए तैयार होती है तो इन्हीं अंडों का इस्तेमाल किया जा सकता है. इसका मकसद अंडों की मौजूदा गुणवत्ता को सुरक्षित रखना होता है, ताकि बढ़ती उम्र का असर उन पर न पड़े. एग फ्रीजिंग की प्रक्रिया की शुरुआत फर्टिलिटी एक्सपर्ट से सलाह लेने से होती है. इसके बाद महिलाओं को कुछ समय तक हार्मोनल दवाएं दी जाती है, जिससे अंडों का उत्पादन बढ़ाया जा सके. जब अंडे तैयार हो जाते हैं तो एक छोटी मेडिकल प्रक्रिया के जरिए उन्हें शरीर से निकाला जाता है. इसके बाद इन अंडों को विशेष तकनीक से फ्रिज करके सुरक्षित स्टोर कर लिया जाता है. एग फ्रीजिंग को आमतौर पर सुरक्षित प्रक्रिया माना जाता है और यह बहुत दर्दनाक नहीं होती है. हालांकि हार्मोनल दवाओं के कारण कुछ महिलाओं को सूजन, मूड स्विंग, सिर दर्द या थकान जैसी समस्या हो सकती है. अंडे निकालने के बाद अगला हल्का दर्द या असहजता महसूस हो सकती है. लेकिन यह लक्षण आमतौर पर कुछ समय में ठीक हो जाते हैं. हालांकि गंभीर समस्याएं बहुत कम मामलों में देखने को मिलती है. वहीं एक्सपर्ट्स के अनुसार एग फ्रीजिंग के लिए 30 से 34 साल की उम्र सबसे उपयुक्त मानी जाती है. इस समय अंडों की गुणवत्ता और संख्या बेहतर होती है. 35 साल के बाद फर्टिलिटी में गिरावट शुरू हो जाती है, जिससे सफलता की संभावना कब हो सकती है. आजकल कई महिलाएं करियर या पर्सनल कारणों से देर से शादी या मां बनने का फैसला करती है. इसके अलावा कुछ मेडिकल स्थितियों जैसे कैंसर या हार्मोनल समस्याओं के कारण भी एग फ्रीजिंग एक ऑप्शन बन जाता है. यही वजह है कि बड़े शहरों में इस तकनीक को लेकर जागरूकता और मांग दोनों बढ़ रही है. वहीं आपको बता दे की एग फ्रीजिंग का खर्च अलग-अलग क्लीनिक और शहरों के हिसाब से बदल सकता है. आमतौर पर एक साइकिल का खर्च करीब 1 लाख से 2.5 लख रुपये के बीच होता है. इसके अलावा अंडों को स्टोर करने का सालाना खर्च भी अलग से देना पड़ता है. कविता गाडरी बीते कुछ साल से डिजिटल मीडिया और पत्रकारिता की दुनिया से जुड़ी हुई है. राजस्थान के जयपुर से ताल्लुक रखने वाली कविता ने अपनी पढ़ाई माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय भोपाल से न्यू मीडिया टेक्नोलॉजी में मास्टर्स और अपेक्स यूनिवर्सिटी जयपुर से बैचलर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन में की है. पत्रकारिता में अपना सफर उन्होंने राजस्थान पत्रिका से शुरू किया जहां उन्होंने नेशनल एडिशन और सप्लीमेंट्स जैसे करियर की उड़ान और शी न्यूज के लिए बाय लाइन स्टोरी लिखी. इसी दौरान उन्हें हेलो डॉक्टर शो पर काम करने का मौका मिला. जिसने उन्हें न्यूज़ प्रोडक्शन के लिए नए अनुभव दिए. इसके बाद उन्होंने एबीपी नेटवर्क नोएडा का रुख किया. यहां बतौर कंटेंट राइटर उन्होंने लाइफस्टाइल, करंट अफेयर्स और ट्रेडिंग विषयों पर स्टोरीज लिखी. साथ ही वह कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी लगातार सक्रिय रही. कविता गाडरी हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में दक्ष हैं. न्यूज़ राइटिंग रिसर्च बेस्ड स्टोरीटेलिंग और मल्टीमीडिया कंटेंट क्रिएशन उनकी खासियत है. वर्तमान में वह एबीपी लाइव से जुड़ी है जहां विभिन्न विषयों पर ऐसी स्टोरीज लिखती है जो पाठकों को नई जानकारी देती है और उनके रोजमर्रा के जीवन से सीधे जुड़ती है.
अंडा फ्रीजिंग क्रेजः भारत में महिलाओं के लिए एक नया विकल्प
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