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अमेरिका और भारत व्यापार समझौते, शुल्क कम करने और भारतीय वस्तुओं को बढ़ावा देने पर सहमत हुए

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अमेरिका और भारत व्यापार समझौते, शुल्क कम करने और भारतीय वस्तुओं को बढ़ावा देने पर सहमत हुए
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भारत और अमेरिका के बीचट्रेड जीलपर सहमति बन गई है. इस डील की अभी डिटेल्स सामने नहीं आई है, लेकिन अमेरिका ने भारत पर लगाए 50 फीसदी टैरिफ को कमकर 18 फीसदी करने का ऐलान कर दिया है. ये कितनी बड़ी बात है, इसे समझने के लिए पहले अपने आसपास के देशों पर अमेरिका के लगाए टैरिफ को जान लें.हाई टैरिफ झेल रहे देशअमेरिका के सबसे हाई टैरिफ का सामना करने वाले कुछ देशों में ब्राजील (50 प्रतिशत), म्यांमार (40 प्रतिशत), लाओस (40 प्रतिशत), चीन (37 प्रतिशत) और दक्षिण अफ्रीका (30 प्रतिशत) शामिल हैं. वहीं भारत के पड़ोसी देशों में वियतनाम (20 प्रतिशत), बांग्लादेश (20 प्रतिशत), पाकिस्तान (19 प्रतिशत), मलेशिया (19 प्रतिशत), कंबोडिया (19 प्रतिशत) और थाईलैंड (19 प्रतिशत) पर अमेरिका टैरिफ लगा रहा है. मतलब भारत का सामान इन सब देशों से अमेरिका में सस्ता मिलेगा. जाहिर है सस्ता होगा तो बिकेगा भी ज्यादा.कम टैरिफ वाले देशवहीं अगर बात करें कि अमेरिका ने सबसे कम टैरिफ किन देशों पर लगाए हैं तो उनमें यूनाइटेड किंगडम (10 प्रतिशत), यूरोपीय संघ (15 प्रतिशत), स्विट्जरलैंड (15 प्रतिशत), जापान (15 प्रतिशत) और दक्षिण कोरिया (15 प्रतिशत) शामिल हैं. जाहिर है ये सब अमेरिका के सबसे क्लोज सहयोगी हैं. मगर अगर इनसे भी तुलना करें तो भारत को कोई खतरा नहीं है. कारण भारत से जाने वाले सामान अलग तरह के हैं और ये अलग तरह के सामान अमेरिका को बेचते हैं. इसके साथ ही इनके यहां लेबर कॉस्ट महंगा होने से वैसे भी इनके सामान महंगे होते हैं, तो टैरिफ कम होने के बावजूद ये भारतीय सामानों से कंपटिशन नहीं कर सकते.भारत से भेजा जाना वाला सामानभारत दुनिया में सबसे ज्यादा एक्सपोर्ट अमेरिका को करता रहा है. भारत के लिए वो सबसे बड़ा बाजार है. भारत इंजीनियरिंग सामान, इलेक्ट्रॉनिक सामान, रत्न और आभूषण, दवा निर्माण सामान, जैविक पेट्रोलियम उत्पाद, एग्रीकल्चरल प्रोडक्ट्स जैसे चाय, कॉफी, मसाले, आदि, टेक्सटाइल और कपड़े जैसे कपास, रेशम, आदि, ऑटोमोबाइल और ऑटो पार्ट्स जैसे कार, ट्रक, आदि, फार्मा उत्पाद जैसे दवाएं, वैक्सीन, आदि, आईटी सेवाएं जैसे सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, आईटी सपोर्ट, आदि अमेरिका को एक्सपोर्ट करता है. इसके अलावा भी कई और सामान भारत की तरफ से अमेरिका को एक्सपोर्ट किया जाता है, लेकिन सबसे ज्यादा मांग इन्हीं की रहती है. भारत का अमेरिकी बाजार में असली कंपटिशन चीन, बांग्लादेश और वियतनाम से होता है. कारण है कि इन देशों में लेबर कॉस्ट बेहद कम है और इस कारण अगर इनका टैरिफ भारत से कम हो तो भारत का सामान महंगा हो जाता है.डिप्लोमेटिक जीत कैसेभारत-अमेरिका के बीच ट्रेड डील को लेकर सहमति बनना दुनिया के लिए अच्छी खबर है. कारण ये है कि भारत और अमेरिका रणनीतिक रूप से एक-दूसरे के पूरक हैं. व्यापार को लेकर अमेरिका और भारत में बहुत पहले से असहमति रही है, मगर ट्रंप के दूसरी बार सत्ता में आने के बाद ये विवाद में बदल गया. ट्रंप ने चीन सहित दुनिया के तमाम देशों पर टैक्स लगाया. अभी सबसे ज्यादा टैक्स ब्राजील और चीन ही झेल रहे हैं. कारण वो ट्रंप के टैरिफ का सार्वजनिक जवाब देने के चक्कर में फंस गए. ये दोनों देश भी अमेरिका को सामान बेच ज्यादा रहे थे और खरीद कम रहे थे. ठीक भारत की तरह. मगर भारत चुप रहा. वो व्यापार को लेकर अपनी असहमति दोनों देशों की मीटिंग में तो रखता रहा, लेकिन खुलकर अमेरिका की आलोचना से बचता रहा. शुरू में लगा चीन और ब्राजील की तरह भारत का जवाब नहीं देना उसकी कमजोरी है, लेकिन आज लग रहा है कि भारत सही रास्ते पर चला और आज नतीजा सामने है.यूरोप-अमेरिका संग भारत का महत्वहाल में भारत ने यूरोप के साथ ट्रेड डील की घोषणा की है. इसके बाद अमेरिका से भी ट्रेड डील तय हो गई है. जाहिर है अमेरिका और यूरोप के बाजारों में भारत का एक्सपोर्ट बढ़ेगा. वहीं तीनों मिलकर लाइफलाइन बन चुके चीन को दुनिया में अलग-थलग कर सकते हैं. भारत को इन दोनों डील से न सिर्फ बड़ा बाजार मिलेगा बल्कि तकनीक और निवेश भी मिलने की संभावना है. चीन का रेयर अर्थ मैटेरियल पर लगभग कब्जा है. भारत, यूरोप और अमेरिका मिलकर उसके इस वर्चस्व को तोड़ सकते हैं. अभी भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर अमेरिका में ही हैं. दोनों देश रेयर अर्थ मैटेरियल पर भरोसेमंद और अलग-अलग सप्लाई चेन स्थापित करना चाहते हैं.इसके साथ ही यूरोप और अमेरिका की बड़ी चिंता सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में चीन की बढ़ती ताकत है. ताइवान के बाद वो ही सबसे ज्यादा सेमीकंडक्टर बनाता है. ताइवान पर चीन की घेराबंदी को देखते हुए यूरोप और अमेरिका के साथ दुनिया के लिए ये जरूरी है कि सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में अलग सप्लाई चेन बने. सेमीकंडक्टर बनाने की सभी बड़ी मशीनें और तकनीक तो अमेरिका ही सप्लाई करता है, लेकिन इनको बनाने में लगने वाला रेयर अर्थ मैटेरियल चीन से आता है. साथ ही सेमीकंडक्टर सबसे ज्यादा संख्या में बनाते भी चीन और ताइवान ही हैं. अमेरिका और यूरोप अपनी सुरक्षा के लिए चाहते हैं कि भारत में सेमीकंडक्टर हब बने, जिससे सप्लाई चेन सुरक्षित रहे. एआई के क्षेत्र में भी चीन अमेरिका और यूरोप से आगे निकलता दिख रहा है. ऐसे में भारत, अमेरिका और यूरोप का 'ब्रेन' एकसाथ मिलकर चीन को चुनौती दे सकता है.चुनौती क्या हैएक्सपर्ट्सका मानना है कि अमेरिका भारत ट्रेड डील को लेकर चुनौती सबसे बड़ी ट्रंप की घोषणाएं ही हैं. ट्रंप ने सोमवार को जब इस समझौते की घोषणा की तब उन्होंने लिखा कि भारत रूस से तेल खरीद बंद करने पर सहमत हो गया है. साथ ही भारत अमेरिका से पहुंचने वालों सामानों पर जीरो फीसदी तक टैक्स कर देगा. इसके अलावा उन्होंने बताया कि भारत 500 अरब डॉलर से अधिक के अमेरिकी सामान खरीदेगा. इन तीन बातों ने दुनिया भर में इस ट्रेड डील को लेकर असमंजस वाली स्थिति में डाल दिया है. चीन से लेकर यूरोप और यहां तक की अमेरिका के भी एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत रूस से पूरी तरह दूर नहीं हो सकता. रूस और भारत के संबंधों को हल्के में नहीं लिया जा सकता.भारत भले ही रूस से तेल खरीद कम कर दे पर पूरी तरह बंद करने का ऐलान किसी से नहीं पच रहा. यहां तक की भारत ने भी अब तक इस पर कुछ नहीं कहा है. ट्रंप की जीरो फीसदी करने वाली दूसरी घोषणा पर इंटरनेशनल एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत कभी ऐसा नहीं करेगा. खासकर कृषि के क्षेत्र में तो भारत कभी बाजार नहीं खोलेगा. हां, एक-दो सामानों पर भारत ऐसा कर सकता है. वहीं अमेरिका से 500 अरब डॉलर से अधिक के सामान भारत खरीदेगा ये भी बात लोगों को हजम नहीं हो रही है. चूकि अब तक इस डील के डिटेल्स सामने नहीं आए हैं, इसलिए संदेह बना हुआ है कि क्या और विवाद बाकी हैं. मगर अगर ये हो गया तो दोनों देशों के संबंधों में मील का पत्थर होगा. केंद्रीय पीयूष गोयल ने मंगलवार को भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील को लेकर कहा कि हो सकता है कि भारत और अमेरिका इसी सप्ताह ट्रेड डील को लेकर एक साझा बयान भी दें.रूस को ट्रंप की बात पर यकीन नहीं,बोला- भारत ने तेल की खरीद रोकने की बात नहीं कही

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