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ए. आई. ने रोगियों के निदान में डॉक्टरों को पीछे छोड़ा, अध्ययन से पता चलता है

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ए. आई. ने रोगियों के निदान में डॉक्टरों को पीछे छोड़ा, अध्ययन से पता चलता है
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AI अब सिर्फ रेसिपी बताने और फोटो बनाने के लिए ही नहीं, बल्कि मरीजों का इलाज करने में अपना योगदान निभा रहा है। हाल ही में सामने आई हार्वर्ड की एक नई स्टडी से पता चला है कि एडवांस्ड AI मॉडल मरीजों की बीमारी की पहचान करने में डॉक्टरों से बेहतर परफॉर्म कर सकता है। यहां तक कि इमरजेंसी रूम (ER) में भी। रिसर्चर ने कहा कि OpenAI के एडवांस्ड o1 लैंग्वेज मॉडल को कई अलग-अलग डायग्नोस्टिक स्थितियों में सैकड़ों डॉक्टरों के साथ सीधे मुकाबले में उतारा गया और पाया कि AI ने बीमारी पहचानने और उसके इलाज करने की प्लानिंग करने दोनों ही मामलों में डॉक्टरों से लगातार बेहतर प्रदर्शन किया।डॉक्टर से अच्छा काम कर रहा एआई'साइंस' जर्नल में छपी नई रिसर्च में बताया गया कि इजराइल डिकनेस मेडिकल सेंटर के इमरजेंसी रूम से 76 क्लिनिकल केस OpenAI के o1 मॉडल और दो एक्सपर्ट डॉक्टरों को दिए गए। रिसर्च करने वालों ने पाया कि o1 ने कई तरह के कामों में इंसानी एक्सपर्ट्स के बराबर या उनसे काफी बेहतर परफॉर्म किया। जब सबसे कम जानकारी उपलब्ध थी, तब o1 ने 67.1% मामलों में एकदम सही या उसके बहुत करीब की बीमारी की पहचान की। जबकि दोनों डॉक्टरों की सटीकता 55.3% और 50% रही।जैसे-जैसे डॉक्टर को मरीज के बारे में ज्यादा जानकारी मिलती गई। मॉडल की सटीकता बढ़कर 72.4% हो गई, जबकि दोनों डॉक्टरों की सटीकता 61.8% और 52.6% थी। जब मरीजों को मेडिकल फ्लोर या ICU में भर्ती किया गया तो o1 की सटीकता 81.6% तक पहुंच गई। इस बार भी इसने दोनों डॉक्टरों को पीछे छोड़ दिया।जोखिम वाला हो सकता है कामस्टडी में यह भी पाया गया कि जबAIसे इलाज करने की प्लानिंग जैसे एंटीबायोटिक लिखना या जीवन के अंतिम समय के फैसले लेने को कहा गया तो वो डॉक्टर से आगे था। पांच केस स्टडीज में, AI ने 89% का औसत स्कोर हासिल किया, जो डॉक्टरों के स्कोर से काफी ज्यादा था। डॉक्टरों ने ट्रेडिशनल तरीकों का इस्तेमाल करते हुए लगभग 34% और GPT-4 का इस्तेमाल करते हुए 41% स्कोर किया था।रिसर्चर ने कहा कि क्लिनिकल फैसले लेने में मदद करने के लिए AI का इस्तेमाल करना कभी-कभी एक ज्यादा जोखिम वाला काम माना जाता है, लेकिन इन उपकरणों का ज्यादा इस्तेमाल, जांच में गलती, देरी और इलाज तक पहुंच की कमी को कम करने में मददगार हो सकता है।ऐसी रिसर्च की है जरूरतहालांकि, रिसर्चर ने यह चेतावनी भी दी है कि क्लिनिकल मेडिसिन में बिना टेक्स्ट के इनपुट की भरमार होती है। जैसे कि मरीजों की शारीरिक तकलीफ का लेवल या मेडिकल इमेजिंग की जानकारी। उनका सुझाव है कि इसका मतलब यह है कि भविष्य में ऐसे रिसर्चर की जरूरत है जो यह आकलन कर सके कि इंसान और मशीनें किस तरह प्रभावी ढंग से मिलकर काम कर सकते हैं।

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Publisher: Navbharat Times

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