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कठुआ जिले में बच्चों में बढ़ रहे मधुमेह के मामलेः विशेषज्ञों ने चिंता व्यक्त की

Amar Ujala
कठुआ जिले में बच्चों में बढ़ रहे मधुमेह के मामलेः विशेषज्ञों ने चिंता व्यक्त की
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कम उम्र बच्चों की सेहत पर असर को लेकर जीएमसी कठुआ के विशेषज्ञों ने जताई चिंताऔर पढ़ेंTrending Videosकहा-बदलती जीवनशैली, जंक फूड और स्क्रीन टाइम बने बड़ी वजहसंवाद न्यूज एजेंसीकठुआ। जिले में डायबिटीज (मधुमेह) के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य विभाग और आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। जिले के सबसे बड़े स्वास्थ्य संस्थान में ओपीडी के दौरान 100 में से दाे से तीन बच्चे मोटापे या फिर डायबिटीज के शिकार हो रहे हैं।राजकीय मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) कठुआ के मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. बद्री नाथ भोगल के अनुसार अब यह बीमारी सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही। यह बच्चों और किशोरों में भी तेजी से फैल रही है। मौजूदा स्थिति यह है कि इलाज के लिए आने वाले हर 100 मरीजों में दो से तीन किशोर हैं। यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।भोगल के अनुसार पहले टाइप-2 डायबिटीज को वयस्कों की बीमारी माना जाता था लेकिन अब कम उम्र में भी इसके मामले सामने आ रहे हैं। वहीं टाइप-1 डायबिटीज, जो ऑटोइम्यून कारणों से होती है, उसके मामलों में भी बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। यह बदलाव बच्चों की बदलती दिनचर्या और खानपान से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।विज्ञापनविज्ञापनविशेष रूप से बच्चों में जंक फूड, मीठे पेय पदार्थ और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों का बढ़ता सेवन इस बीमारी की मुख्य वजह बन रहा है। पारंपरिक और संतुलित आहार की जगह फास्ट फूड ने ले ली है, जिससे शरीर में शुगर और फैट का स्तर असंतुलित हो रहा है।इसके साथ ही शारीरिक गतिविधियों में आई कमी भी एक बड़ा कारण है। बच्चे अब खेलकूद की बजाय मोबाइल, टीवी और वीडियो गेम्स में अधिक समय बिता रहे हैं। इससे मोटापे के मामले बढ़ रहे हैं और डायबिटीज का खतरा भी बढ़ रहा है। इसके अतिरिक्त पारिवारिक इतिहास और जेनेटिक कारण भी इस बीमारी के जोखिम को बढ़ाते हैं। इसके अलावा तनाव, पढ़ाई का दबाव और पर्याप्त नींद की कमी भी शरीर के मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करती है।भोगल के अनुसार बच्चों में बार-बार प्यास लगना, पेशाब की आवृत्ति बढ़ना, अचानक वजन कम होना, थकान और अधिक भूख लगना डायबिटीज के प्रमुख लक्षण हैं। कई मामलों में ये संकेत स्पष्ट नहीं होते, जिससे बीमारी का पता देर से चलता है। स्थिति गंभीर हो सकती है। ऐसे में अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों की दिनचर्या और खानपान पर विशेष ध्यान दें। समय-समय पर जांच करवाना और लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना बेहद जरूरी है।इस बीमारी से बचाव के लिए जीवनशैली में सुधार आवश्यक है। बच्चों को संतुलित और पौष्टिक आहार देना, रोजाना शारीरिक गतिविधि सुनिश्चित करना और स्क्रीन टाइम को सीमित करना जरूरी है। इसके साथ ही नियमित स्वास्थ्य जांच और वजन नियंत्रण पर ध्यान देना भी आवश्यक है।

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