सोने की कीमतों में भले की गिरावट देखने को मिल रही है, लेकिन आने वाले दिनों में इसकी चमक डबल हो सकती है। दिग्गज ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म जेपी मॉर्गन ने अनुमान जताया है कि साल 2026 के अंत तक सोना 4,500 डॉलर और 2027 के मध्य तक 5,000 डॉलर प्रति औंस के ऐतिहासिक स्तर (Gold Price Prediction 2027) को छू सकता है। वहीं, अमेरिकी बैंक जेफरीज का अनुमान है कि साल 2027 तक सोना 10 हजार डॉलर के पार जा सकता है। बैंकों का अनुमान है कि अमेरिकी ब्याज दरों, कमजोर डॉलर, सेंट्रल बैंकों की ताबड़तोड़ खरीदारी और सरकारी कर्ज की चिंताओं के बीच सोने की लंबी अवधि की चाल बेहद मजबूत नजर आ रही है। वहीं एक्सपर्ट्स का मानना है कि बुलियन मार्केट का असली जलवा अभी बाकी है, जो दीवाली से पहले दिखाई दे सकता है। जेपी मॉर्गन का अनुमान है कि साल 2026 के अंत तक सोना 4,500 डॉलर प्रति औंस (Gold Price Prediction 2026) और 2027 के मध्य तक 5,000 डॉलर प्रति औंस (भारतीय करेंसी के हिसाब से 1.54 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम) के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकता है। हालांकि, यहां समझना जरूरी है कि जेपी मॉर्गन की ये भविष्यवाणी अमेरिकी बाजार के आधार पर है। अगर 5000 डॉलर को भारत के हिसाब से देखें तो यह कीमत 1.77 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम (Gold Price Outlook) से ऊपर बैठती है। दरअसल, भारत ज्यादातर सोना इंपोर्ट करता है। जिस पर वह 15 फीसदी इंपोर्ट ड्यूटी लगाता है। यानी अगर कीमत 5000 डॉलर प्रति औंस यानी 1.54 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम पहुंचती है तो इस पर 15 फीसदी इंपोर्ट ड्यूटी भी लगेगी। कैलकुलेशन से समझें तो- गोल्ड की कीमतों ने पिछले महीने गजब की तेजी दिखाई थी। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (World Gold Council) के आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त में एलबीएमए गोल्ड प्राइस पीएम (LBMA Gold Price PM) करीब 13 फीसदी बढ़कर 4,386 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गया था। यह पिछले करीब तीन दशकों में सोने की सबसे मजबूत मासिक तेजी में से एक थी। इस रिकॉर्ड उछाल के पीछे निवेशकों की ताबड़तोड़ खरीदारी और अमेरिकी डॉलर में आई कमजोरी मुख्य वजह थी। हालांकि, सितंबर आते-आते तस्वीर बदली और अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में 3.9 फीसदी तथा भारतीय बाजार में 4.6 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। इसकी बड़ी वजह फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर बदलती उम्मीदें और गोल्ड ईटीएफ (Gold ETF) में निवेश की रफ्तार का धीमा होना है। सोने की कीमतों पर सबसे ज्यादा असर रियल यील्ड यानी महंगाई घटाने के बाद मिलने वाला रिटर्न का पड़ता है। चूंकि सोना खुद कोई ब्याज या डिविडेंड नहीं देता, इसलिए जब दूसरे निवेश विकल्पों से रिटर्न कम होता है, तो सोना रखने की लागत घट जाती है और इसकी मांग बढ़ जाती है। इसके अलावा, अमेरिकी डॉलर कमजोर होने पर अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के लिए सोना सस्ता और आकर्षक हो जाता है। सोने की इस लंबी दौड़ में दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों की भूमिका बेहद अहम हो गई है। केंद्रीय बैंक जब अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोना बढ़ाते हैं, तो बाजार में एक अलग स्तर की डिमांड पैदा होती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण चीन है। पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना (People's Bank of China) ने जुलाई में 20 टन सोना खरीदा था, जो अक्टूबर 2023 के बाद उसकी सबसे बड़ी मासिक खरीद थी। चीन की यह सोने की खरीदारी लगातार 21वें महीने भी जारी रही। जेपी मॉर्गन ने अमेरिकी सरकारी कर्ज और करेंसी डिबेसमेंट (मुद्रा का मूल्य घटने) की चिंताओं को भी इस तेजी का बड़ा आधार बताया है। भारत की बात करें तो सितंबर में अंतरराष्ट्रीय बाजार के मुकाबले घरेलू बाजार में सोने की कीमतें ज्यादा टूटी हैं। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) के अनुसार, भारत में सोने का कारोबार इस समय इम्पोर्ट पैरिटी से नीचे चल रहा है। 11 सितंबर तक यह अंतर 78 डॉलर प्रति औंस था, जो जुलाई में 34 डॉलर और अगस्त में 51 डॉलर था। देश में पुरानी ज्वैलरी को बदलकर नई ज्वेलरी खरीदने का चलन बढ़ने और अनौपचारिक सप्लाई के कारण यह डिस्काउंट और बढ़ गया है।
जेपी मॉर्गन ने सोने की कीमतों के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंचने का अनुमान लगाया
Dainik Jagran•
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