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दुर्लभ पृथ्वी खनिजों में चीन को चुनौती देने की भारत की महत्वाकांक्षी योजना

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दुर्लभ पृथ्वी खनिजों में चीन को चुनौती देने की भारत की महत्वाकांक्षी योजना
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भारत 21वीं सदी की टेक्नोलॉजी रेस में सिर्फ उपभोक्ता नहीं, आपूर्तिकर्ता (सप्लायर) बनने की दिशा में बढ़ रहा है. इसी कड़ी में रेयर अर्थ मिनरल यानी रेयर अर्थ एलिमेंट्स (REEs) पर सरकार का खास फोकस दिख रहा है. आम बजट 2026 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रेयर अर्थ कॉरिडोर बनाने की घोषणा की, जो भारत के तटीय और खनन समृद्ध इलाकों में नई औद्योगिक क्रांति की ज़मीन तैयार कर सकता है. यही नहीं, इस पर फोकस करके भारत चीन का भी तोड़ निकालने की कोशिश में है, क्योंकि रेयर अर्थ एलिमेंट्स मामले में चीन सबसे ऊपर है और भारत 5वीं पोजिशन पर है. आइए, केन्द्रीय बजट में हुई घोषणा के बहाने इससे जुड़े कुछ सवाल हल करने का प्रयास करते हैं. जैसे, भारत में कहां-कहां रेयर अर्थ मिनरल का भंडार है? किन राज्यों में सरकार का फोकस है? कहां-कहां रेयर अर्थ कॉरिडोर बनेंगे? रेयर अर्थ मिनरल 17 तत्वों का समूह है. 15 लैंथेनाइड, साथ में स्कैन्डियम और इट्रियम. ये दिखने में साधारण खनिजों जैसे मोनाज़ाइट आदि के भीतर छिपे रहते हैं, लेकिन आधुनिक टेक्नोलॉजी की रीढ़ इन्हीं पर टिकी है. इनका इस्तेमाल मुख्य रूप से स्मार्टफोन, लैपटॉप, हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) के मोटर और बैटरी, विंड टर्बाइन व अन्य ग्रीन एनर्जी टेक्नोलॉजी, सैटेलाइट, रडार, मिसाइल और डिफेंस सिस्टम और हाई-परफॉर्मेंस परमानेंट मैग्नेट, लेज़र, मेडिकल इमेजिंग आदि में होता है. अभी इस मामले में दुनिया की सप्लाई चेन में चीन की हिस्सेदारी बहुत अधिक है. यही कारण है कि रेयर अर्थ पर नियंत्रण सिर्फ आर्थिक नहीं, रणनीतिक (स्ट्रैटेजिक) शक्ति भी माना जाता है. भारत के रेयर अर्थ संसाधन मुख्य रूप से बीच सैंड (समुद्री तटों की रेत) और कुछ आंतरिक खनिज भंडारों में केंद्रित हैं. केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा समेत कई अन्य राज्यों में रेयर अर्थ मिनरल के भंडार की संभावनाएं हैं. केन्द्रीय बजट 2026 में सरकार ने जिन राज्यों को स्पष्ट रूप से रेयर अर्थ कॉरिडोर के लिए चिन्हित किया है, उनमें ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु मुख्य हैं. सरकार का प्रस्ताव है कि इन खनिज समृद्ध राज्यों को रेयर अर्थ मिनरल कॉरिडोर विकसित करने के लिए सहायता दी जाएगी, जिसमें माइनिंग (खनन), प्रोसेसिंग (अयस्क से रेयर अर्थ अलग करना व शुद्धिकरण), रिसर्च एंड डेवलपमेंट, मैन्युफैक्चरिंग, ख़ासकर परमानेंट मैग्नेट और अन्य हाई-वैल्यू प्रोडक्ट आदि शामिल हैं. बजट 2026 की घोषणा के मुताबिक, कॉरिडोर का फोकस मुख्यतः तटीय राज्यों के बीच सैंड मोनाज़ाइट डिपॉज़िट पर है. व्यापक रूप में कॉरिडोर की रूपरेखा कुछ इस तरह समझी जा सकती है. कॉरिडोर की सटीक भूगोलिक सीमाएं, क्लस्टर की लोकेशन, और प्रोजेक्ट की सूक्ष्म डिटेल आगे आने वाली सरकारी अधिसूचनाओं, डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट, और राज्यों की नीतियों से स्पष्ट होंगी. अभी यह एक फ्रेमवर्क और नीति-सूचना के रूप में सामने आया है. बजट 2026 रेयर अर्थ कॉरिडोर जितना आकर्षक दिखता है, उतने ही गंभीर सवाल भी उठते हैं. बीच सैंड माइनिंग समुद्री तट के इकोसिस्टम, मछुआरा समुदायों और तटीय जैव विविधता पर असर डाल सकती है. रेयर अर्थ प्रोसेसिंग में केमिकल इस्तेमाल और रेडियोएक्टिव बाइ-प्रोडक्ट (जैसे थोरियम युक्त अपशिष्ट) का सुरक्षित निपटान बेहद ज़रूरी है. जमीन का अधिग्रहण, तटीय इलाकों का उपयोग, और पारंपरिक आजीविका (मत्स्य पालन आदि) पर प्रभाव जैसे मुद्दे सामने आएंगे. ट्रांसपेरेंट कंसल्टेशन, उचित मुआवज़ा, और स्थानीय लोगों के लिए प्राथमिकता से नौकरी सुनिश्चित करना ज़रूरी होगा. खनन से लेकर हाई-एंड मैग्नेट और इलेक्ट्रॉनिक कम्पोनेंट तक पूरी वैल्यू चेन बनाना आसान नहीं है. इसके लिए विदेशी टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप, R&D में भारी निवेश और स्किल डेवलपमेंट की ज़रूरत होगी, वरना भारत सिर्फ कच्चा माल सप्लायर बनकर रह सकता है. दुनिया भर में जब-तब रेयर अर्थ की कीमतों में तेज़ उतार-चढ़ाव होता है. अगर प्रोजेक्ट्स सिर्फ ऊंचे दाम के दौर को देखकर प्लान किए गए तो भाव गिरने पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है. इसलिए नीतिगत स्थिरता और दीर्घकालिक सोच ज़रूरी है. भारत आज जिस मोड़ पर खड़ा है, वहां रेयर अर्थ मिनरल सिर्फ एक और खनिज संसाधन नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी, सुरक्षा, हरित ऊर्जा और भू-राजनीति के चौराहे पर खड़ा एक रणनीतिक अवसर है. ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में प्रस्तावित रेयर अर्थ कॉरिडोर भारत को कई स्तरों पर सशक्त कर सकते हैं. चीनी निर्भरता घटेगी, वैश्विक सप्लाई चेन में भारत की बारगेनिंग पावर बढ़ेगी. बीच सैंड से लेकर हाई-टेक मैग्नेट, EV कंपोनेंट, सैटेलाइट-मिसाइल पार्ट्स तक नई इंडस्ट्री का निर्माण होगा. तटीय और खनन समृद्ध राज्यों में निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर और कौशल विकास की नई लहर उठ सकती है. लेकिन इस अवसर का सही लाभ तभी मिलेगा जब पर्यावरण मानकों, स्थानीय समुदायों के अधिकार, और लॉंग टर्म टेक्नोलॉजी क्षमता पर पारदर्शी और ज़िम्मेदार नीति लागू की जाए. यह भी पढ़ें:भारत के लिए बायोलॉजिक मेडिसिन कैसे बनेगी गेम चेंजर? बजट में ऐलान के बाद समझें पूरा गणित

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