ये कीट अपने प्रजनन के लिए मीठे पानी के इकोसिस्टम पर पूरी तरह निर्भर रहते हैं. इसका मतलब है कि इनका जीवन चक्र छोटा होता है और ये पर्यावरण में आने वाले किसी भी बदलाव पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं. अगर ये पश्चिमी घाट से गायब हो रहे हैं, तो इसका सीधा मतलब है कि वहां के जल निकायों की सेहत बहुत खराब हो चुकी है. 2 साल के गहन सर्वे में क्या चौंकाने वाले सच आए सामने? पश्चिमी घाट में प्रजातियों की कमी के पीछे क्या हैं मुख्य कारण? पश्चिमी घाट 1600 किलोमीटर लंबी पर्वत श्रृंखला है, जहां अब प्रजातियों की भारी गिरावट और आवास विनाश देखा जा रहा है. इकोलॉजिस्ट पंकज कोपार्डे के अनुसार, सर्वे में केवल 65 प्रतिशत प्रजातियों का मिलना आवासों के नुकसान की ओर इशारा करता है. इसके पीछे कई बड़े कारण जिम्मेदार हैं, जिनमें बुनियादी ढांचे का विकास और जलविद्युत परियोजनाएं शामिल हैं. नदियों में बढ़ता प्रदूषण और जमीन के इस्तेमाल में बदलाव ने इन कीटों के घरों को उजाड़ दिया है. इसके अलावा, बेकाबू टूरिज्म, जंगलों में बार-बार लगने वाली आग और क्लाइमेट चेंज इस संकट को और गहरा बना रहे हैं. ग्लोबल लेवल पर कीटों की घटती आबादी का भारत पर क्या होगा असर? हालिया स्टडीज बताती हैं कि पश्चिमी घाट में मीठे पानी के जानवरों की संख्या लगातार कम हो रही है. बाहरी हमलावर प्रजातियां भी स्थानीय जीवों के लिए खतरा बन गई हैं. दुनिया भर में कीटों की आबादी हर साल 1 से 2 प्रतिशत की दर से घट रही है. लगभग 40 प्रतिशत कीट प्रजातियां आज विलुप्त होने की कगार पर हैं. अगर पश्चिमी घाट जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र से ड्रैगनफ्लाई जैसी प्रजातियां गायब होती हैं, तो यह पूरे फूड चेन को बिगाड़ सकता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो पश्चिमी घाट की ये रंगीन दुनिया हमेशा के लिए खत्म हो सकती है. QR स्कैन करें, डाउनलोड करें News18 ऐप या वेबसाइट पर जारी रखने के लिए यहां क्लिक करें
पश्चिमी घाट की कीटों की संख्या में गिरावट आवास विनाश और पर्यावरणीय कारकों से जुड़ी हुई है
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