Achira News Logo
Achira News

भारत का मौसम नियंत्रण से बाहरः रिपोर्ट ने खतरनाक जलवायु संकट का खुलासा किया

ABP News•
भारत का मौसम नियंत्रण से बाहरः रिपोर्ट ने खतरनाक जलवायु संकट का खुलासा किया
Full News
Share:

दिल्ली स्थित प्रतिष्ठित थिंक-टैंक 'सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट' (CSE) और साइंस-पर्यावरण पत्रिका 'डाउन टू अर्थ' की नई रिपोर्ट ने भारत की धड़कनें बढ़ा दी हैं. 'क्लाइमेट इंडिया 2026: एन असेसमेंट ऑफ एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स' शीर्षक से जारी इस रिपोर्ट ने देश के सामने एक भयावह सच ला खड़ा किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2026 के शुरुआती नौ महीनों (जनवरी से सितंबर के बीच के 273 दिनों) में से 92 प्रतिशत दिन (यानी 251 दिन) देश के किसी न किसी हिस्से में चरम मौसमी घटनाओं की चपेट में रहे. यह आंकड़ा इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि भारत में मौसम अब सामान्य चक्र से बाहर निकलकर पूरी तरह से बेकाबू हो चुका है. आइए जानते हैं इस रिपोर्ट के वे खौफनाक पहलू जो यह बताते हैं कि आखिर भारत में मौसम इतना खतरनाक क्यों होता जा रहा है. इस रिपोर्ट में जिन आंकड़ों का खुलासा हुआ है, वे यह दिखाने के लिए काफी हैं कि जलवायु संकट अब किताबों या बहसों का मुद्दा नहीं, बल्कि इंसानी जिंदगियों पर सीधा प्रहार है. देश के अलग-अलग राज्यों में हीटवेव (लू), कड़ाके की ठंड, आकाशीय बिजली (वज्रपात), मूसलाधार बारिश, बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाओं के कारण कुल 3,220 लोगों की जान चली गई. कृषि-प्रधान देश भारत के किसानों के लिए यह रिपोर्ट किसी आफत से कम नहीं है. देश भर में 42.5 लाख हेक्टेयर से अधिक की उपजाऊ फसलें या तो जल गईं या बर्बाद हो गईं. अचानक आई बाढ़ और तूफानों के कारण 1,28,334 मकान मलबे में तब्दील हो गए, जिससे हज़ारों परिवार बेघर हो गए. इंसानों के साथ-साथ मूक पशुओं पर भी इस आपदा का कहर बरपा, और कुल 47,244 मवेशियों की जान चली गई. CSE की रिपोर्ट और मौसम वैज्ञानिकों के विश्लेषण के अनुसार, भारत में मौसम के इस अनियंत्रित होने के पीछे कई बड़े कारण छिपे हैं. वर्ष 2026 की शुरुआत ही चरम बदलावों के साथ हुई. फरवरी 2026, 1901 के बाद से देश का सबसे सूखा और पिछले 125 वर्षों का चौथा सबसे गर्म फरवरी दर्ज किया गया. इस भयंकर गर्मी ने सर्दियों के पारंपरिक पैटर्न को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया. इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान कुल बारिश दीर्घकालिक औसत (LPA) से 13 प्रतिशत कम दर्ज की गई. इसके बावजूद, मानसून के पूरे 122 दिनों के दौरान देश के किसी न किसी हिस्से में भारी बारिश, बादल फटने या बाढ़ जैसी घटनाएं लगातार बनी रहीं. इसका मतलब है कि कम दिनों में बहुत अधिक और विनाशकारी बारिश हुई. रिपोर्ट बताती है कि संकट हर साल गहराता जा रहा है. चरम मौसम के दिनों की हिस्सेदारी 2022-23 के 86-88% से बढ़कर 2024 में 93% और 2025 में रिकॉर्ड 99% तक पहुँच गई थी. पिछले 5 वर्षों में कुल 16,000 से अधिक मौतें और 20.6 मिलियन हेक्टेयर फसल का नुकसान यह चीख-चीख कर कह रहा है कि मौसमी चक्र अपनी स्थिरता खो चुका है. उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश उन राज्यों में सबसे आगे रहे, जहां 273 दिनों में से लगभग 64% दिनों में चरम मौसम देखा गया. अकेले उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 811 मौतें दर्ज की गईं. इसके बाद महाराष्ट्र (286 मौतें) और बिहार (245 मौतें) का स्थान रहा. कृषि को सबसे बड़ा आघात महाराष्ट्र में लगा, जहां 2.83 मिलियन हेक्टेयर फसल प्रभावित हुई. इसके बाद उत्तर प्रदेश और बिहार का नंबर आता है. उत्तर-पश्चिम भारत में सबसे अधिक 235 दिनों तक चरम मौसम दर्ज किया गया, जबकि पूर्व और उत्तर-पूर्व भारत में यह आँकड़ा 218 दिनों का रहा. CSE की महानिदेशक सुनीता नारायण ने इस स्थिति को रेखांकित करते हुए कहा कि "यह जलवायु परिवर्तन का मानवीय चेहरा है, जो अब देश के लगभग हर कोने को अपनी गिरफ्त में ले रहा है. संकल्प ठाकुर पिछले 10 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत न्यूज़ 24 से की, इसके बाद न्यूज़ नेशन में कार्य किया. वर्तमान में वह एबीपी हिंदी डिजिटल में डिप्टी प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं और पिछले सात वर्षों से संस्थान के साथ जुड़े हुए हैं. उन्हें खेल, अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और चुनावी राजनीति से जुड़ी खबरों की गहरी समझ है. इसके अलावा साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेखन उनकी विशेष रुचि और विशेषज्ञता का क्षेत्र है. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है.

Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Achira News.
Publisher: ABP News

Want to join the conversation?

Download our mobile app to comment, share your thoughts, and interact with other readers.