अजय कसानऔर पढ़ेंTrending Videosयह वीडियो/विज्ञापन हटाएंकैथल। सजूमा गांव के प्रगतिशील किसान बलदेव सिंह ने यह साबित कर दिया है कि नई सोच और सही तकनीक से साधारण संसाधनों को भी आय का बड़ा जरिया बनाया जा सकता है। जिस गोबर को आमतौर पर बेकार समझा जाता है, उसी से वर्मी कंपोस्ट तैयार कर उन्होंने सालाना करीब 10 लाख रुपये की कमाई का सफल मॉडल खड़ा किया है।पिछले तीन वर्षों से बलदेव सिंह अपनी करीब डेढ़ एकड़ जमीन पर वर्मी कंपोस्ट यूनिट संचालित कर रहे हैं। वह आसपास के गांवों से गोबर खरीदकर केंचुओं की मदद से उसे जैविक खाद में बदलते हैं। उनकी तैयार खाद ‘डीबी वर्मी कंपोस्ट’ के नाम से बाजार में पहचान बना चुकी है और इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। बलदेव सिंह ने बताया कि उनकी खाद की गुणवत्ता के कारण किसान खुद उनके फार्म पर पहुंचकर इसे खरीदते हैं। एक बैग की कीमत करीब 250 रुपये है। उनका मानना है कि वर्मी कंपोस्ट न केवल फसलों की पैदावार बढ़ाती है, बल्कि मिट्टी की सेहत को भी सुधारती है। उन्होंने इस कार्य का प्रशिक्षण करनाल से लिया और वहीं से केंचुए लाकर इसकी शुरुआत की। संवादविज्ञापनविज्ञापनमेहनत और सही जानकारी से संभव है लाखों की कमाईबलदेव सिंह का कहना है कि यदि किसान मेहनत और सही जानकारी के साथ काम करें तो गोबर से भी लाखों रुपये की आय अर्जित की जा सकती है। जैविक खेती अपनाकर किसान अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं। उनका यह मॉडल न केवल उनकी आय का मजबूत साधन बना है, बल्कि आसपास के किसानों को भी जैविक खेती की ओर प्रेरित कर रहा है।
भारतीय किसानों के अभिनव वर्मी-कम्पोस्ट व्यवसाय ने 10 लाख रुपये की वार्षिक आय देखी
Amar Ujala•

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