आज की हाई स्पीड लाइफ में फिट रहना सिर्फ एक ट्रेंड नहीं, बल्कि जरूरत बन गया है. लोग अब सिर्फ पतले दिखने के बजाय अंदर से मजबूत और हेल्दी रहना चाहते हैं, जिसके लिए सोशल मीडिया, फिटनेस इन्फ्लुएंसर्स और हेल्थ एक्सपर्ट्स लगातार प्रोटीन के महत्व पर जोर दे रहे हैं. इसी बीच वजन घटाने वाली नई दवाएं खासकर GLP-1 ने इस सोच को और तेज कर दिया है. इन दवाओं से वजन तो कम होता है, लेकिन साथ ही मसल्स के घटने का खतरा भी रहता है, यही वजह है कि अब लोग अपनी डाइट में प्रोटीन को पहले से कहीं ज्यादा अहमियत देने लगे हैं. इसका नतीजा यह हुआ कि जो चीज कभी सिर्फ एक बाय प्रोडक्ट मानी जाती थी. व्हे प्रोटीन आज हेल्थ इंडस्ट्री की अधिक डिमांड वाली चीज बन चुकी है. जिम जाने वाले युवाओं से लेकर आम महिलाएं और बुजुर्ग तक हर कोई अब हाई-प्रोटीन फूड्स की तलाश में है. व्हे प्रोटीन दूध से चीज बनाने के दौरान निकलने वाला एक पोषक तत्व है. एक समय था जब इसे बेकार समझाकर फेंक दिया जाता था, या जानवरों के चारे के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था. लेकिन आज वही व्हे फिटनेस और हेल्थ इंडस्ट्री का सुपरस्टार बन चुका है. अब यह दही, प्रोटीन ड्रिंक्स, स्नैक्स और यहां तक कि रोजाना के खाने में भी शामिल हो रहा है. हाल ही में आई रिपोर्ट्स के अनुसार, व्हे प्रोटीन कॉन्संट्रेट(WPC 80) की कीमत पिछले एक साल में करीब 90 प्रतिशत तक बढ़ गई है. इसकी कीमत लगभग 20,000 यूरो प्रति टन तक पहुंच गई है. यह बढ़ोतरी अन्य डेयरी प्रोडक्ट्स जैसे दूध पाउडर और चीज की तुलना में काफी ज्यादा है, इससे साफ है कि बाजार में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि GLP-1 जैसी वजन घटाने वाली दवाओं का इस बढ़ती मांग में बड़ा योगदान है. ये दवाएं भूख को कम करती हैं, जिससे लोग कम खाना खाते हैं. लेकिन इसके साथ एक समस्या यह भी होती है कि शरीर में मसल्स कम होने लगते हैं, ऐसे में लोग ज्यादा प्रोटीन लेने लगते हैं ताकि मसल्स को नुकसान न हो. यही वजह है कि व्हे प्रोटीन की डिमांड तेजी से बढ़ रही है. हाल के समय में जीएलपी-1 जैसी वजन घटाने वाली दवाओं के कारण व्हे प्रोटीन की मांग तेजी से बढ़ी है। अर्ला फूड्स इंग्रेडिएंट्स के मैनेजिंग डायरेक्टर लुइस क्यूबल के अनुसार, अब इंडस्ट्री के सामने चुनौती यह है कि क्या प्रोडक्शन को और बढ़ाया जा सकता है. अर्ला फूड्स (जो लुरपाक बटर बनाती है) और फ्राइसलैंडकैम्पिना जैसी डेयरी कंपनियां अपनी ताकत बढ़ा रही हैं. वहीं, डैनोन का ओइकोस योगर्ट और बेल ग्रुप का बेबीबेल प्रोटीन जैसे प्रोडक्ट भी बाजार में आ रहे हैं. कुल मिलाकर, बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए कंपनियां तेजी से काम कर रही हैं. बड़ी डेयरी कंपनियां अब इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए अपने प्रोडक्शन को बढ़ा रही हैं, कई कंपनियां नए प्लांट लगा रही हैं और मॉर्डन तकनीक में निवेश कर रही हैं. इसके साथ ही फूड कंपनियां हाई-प्रोटीन प्रोडक्ट्स जैसे दही, ड्रिंक्स, स्नैक्स और चीज बाजार में ला रही हैं, ताकि हेल्थ कॉन्शियस लोगों को अट्रैक्ट किया जा सके. व्हे प्रोटीन की बढ़ती कीमतों के चलते अब कंपनियां इसके ऑप्शन भी तलाश रही हैं, इसकी वजह से ही मटर, दाल और अन्य प्लांट-बेस्ड प्रोटीन की मांग भी बढ़ रही है. इसके अलावा, कुछ स्टार्टअप्स नई तकनीक जैसे प्रिसिजन फर्मेंटेशन के जरिए प्रोटीन बनाने पर काम कर रहे हैं. डिमांड के मुकाबले सप्लाई अभी भी कम है, इंडस्ट्री के पास इतनी शक्ति नहीं है कि वह तुरंत ज्यादा मात्रा में हाई-क्वालिटी व्हे प्रोटीन बना सके. यही कारण है कि कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि ज्यादा प्रोटीन वाले प्रोडक्ट्स बनाते समय टेस्ट को बरकरार रखना मुश्किल हो जाता है. अगर स्वाद अच्छा न हो तो ग्राहक उन्हें पसंद नहीं करते. कुल मिलाकर, वेट लॉस दवाओं और हेल्दी लाइफस्टाइल के बढ़ते ट्रेंड ने व्हे प्रोटीन की मांग को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है. इससे डेयरी और फूड इंडस्ट्री में नए मौके पैदा हुए हैं, लेकिन साथ ही सप्लाई, कीमत और टेस्ट जैसी चुनौतियां भी सामने आई हैं. आने वाले समय में इस सेक्टर में और तेजी से बदलाव देखने को मिल सकते हैं.
मट्ठा प्रोटीनः अपशिष्ट उत्पाद से लेकर फिटनेस उद्योग के सुपरस्टार तक
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