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मध्य पूर्व में तनाव के बीच वैश्विक शक्तियां अमेरिका के साथ एकजुटः ऊर्जा सुरक्षा और अस्थिरता अभियान का समर्थन

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मध्य पूर्व में तनाव के बीच वैश्विक शक्तियां अमेरिका के साथ एकजुटः ऊर्जा सुरक्षा और अस्थिरता अभियान का समर्थन
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नई दिल्ली:मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका के साथ कई देशों का खड़ा होना सिर्फ कूटनीतिक समर्थन नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, सैन्य निर्भरता और क्षेत्रीय अस्थिरता का सीधा असर है. विशेषज्ञ मानते हैं कि हालात अगर बिगड़े, तो यह संघर्ष सीमित नहीं रहेगा और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बड़ा झटका लग सकता है.US के सपोर्ट में इतने देशदरअसल कल ही ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड और जापान ने एकसंयुक्त बयान जारीकिया है, जिसमें उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए मिलकर प्रयास करने और ऊर्जा बाजारों को स्थिर करने के लिए कदम उठाने की बात कही है. इन देशों ने ईरान द्वारा किए जा रहे हमलों की निंदा की और उससे तुरंत ऐसी गतिविधियां बंद करने को कहा.ऐसे में सवाल उठता है कि ये देश आखिर US के समर्थन में क्यों खड़े होते दिख रहे हैं, जबकि कुछ दिनों पहले तक कई देश इस जंग से किनारा करते नजर आ रहे थे. आइए इस बदलाव के कारणों को समझते हैं.यह भी पढ़ें-होर्मुज को मुट्ठी में करने की कोशिश में जुटा अमेरिका, ईरानी जहाजों पर हमला, ड्रोन्स को ठिकाने लगायाऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ा कारणअंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसियों और विश्लेषकों (जैसे International Energy Agency) के मुताबिक, खाड़ी क्षेत्र से दुनिया की बड़ी तेल-गैस सप्लाई होती है. खासतौर पर Strait of Hormuz से दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से का तेल गुजरता है. यूरोप, जो पहले ही रूस से ऊर्जा निर्भरता कम कर चुका है, इस रूट पर ज्यादा निर्भर है. इसी वजह से यूरोपीय देश अमेरिका के साथ खड़े नजर आ रहे हैं. यह रणनीतिक मजबूरी है, न कि केवल राजनीतिक समर्थन.NATO की भूमिका पर ट्रंप के सवालNATO पश्चिमी देशों की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था का मुख्य आधार है. हालांकि डोनाल्ड ट्रंप पहले NATO को बेकार बता चुके हैं, लेकिन यूक्रेन युद्ध और मौजूदा तनाव ने यह साफ कर दिया है कि यूरोप की सैन्य क्षमता अभी भी अमेरिका पर निर्भर है.बड़े युद्ध की स्थिति में NATO का ढांचा ही सबसे अहम सुरक्षा कवच रहेगा.क्या जंग फैलने का खतरा है?अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक (जैसे Council on Foreign Relations) और सुरक्षा विश्लेषकों के अनुसार, तीन बड़े जोखिम हैं:यह भी पढ़ें-दुनिया की कमर तोड़ रहा ईरान-इजरायल युद्ध, तेल, गैस और ट्रांसपोर्ट की कीमतों में भारी उछाल; समुद्री रास्तों से लेकर हवाई किराए तक असर1. होर्मुज बंद होने का खतराअगर ईरान इस जलमार्ग को पूरी तरब बंद करता है तो तेल की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित होगी. वैश्विक कीमतों में तेज उछाल आ सकता है.2. क्षेत्रीय शक्तियों की एंट्रीखाड़ी देश (सऊदी अरब, UAE) सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हो सकते हैं. इससे संघर्ष रीजनल वॉर में शिफ्ट हो सकता है.3. रूस के फायदे से भी पश्चिमी देशों में चिंतारूस को इस संकट से फायदा मिल सकता है क्योंकि ऊंची कीमतों पर उसका तेल बिकेगा. हालांकि चीन फिलहाल संतुलन बनाकर चल रहा है, लेकिन स्थिति बिगड़ने पर उसकी भूमिका भी अहम हो सकती है.यह भी पढ़ें-VIDEO: मौत बस छूकर निकल गई... लेबनान में रिपोर्टिंग कर रहा था पत्रकार, पीछे धमाके के साथ गिरी इजरायली मिसाइलरूस को कैसे फायदा?ऊर्जा बाजार के विशेषज्ञों के मुताबिक मिडिल ईस्ट में अस्थिरता बढ़ने से सप्लाई कम होगी. कीमतें बढ़ेंगी. ऐसे में रूस, जो पहले प्रतिबंधों से जूझ रहा था, ऊंचे दाम पर तेल बेच सकेगा.मजबूरी है ये गठजोड़!ऐसे में आसान भाषा में समझें तो अमेरिका के साथ देशों का आना 'ब्लॉक पॉलिटिक्स' नहीं, बल्कि 'क्राइसिस मैनेजमेंट' है. ऊर्जा सप्लाई का डर, सैन्य सुरक्षा की जरूरत और क्षेत्रीय अस्थिरता इन तीन वजहों ने इस गठजोड़ को मजबूती दी है. हालांकि अभी स्थिति पूर्ण युद्ध की नहीं है, लेकिन विशेषज्ञ साफ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर होर्मुज पर असर पड़ा या कोई बड़ा देश सीधे टकराव में आया, तो यह संघर्ष तेजी से वैश्विक संकट में बदल सकता है.

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