जयपुर:राजस्थान के धोरों से एक ऐसी खबर आई है जो राज्य के विकास पर सवालिया निशान लगा रही है। जैसलमेर और बाड़मेर के रेगिस्तानी जिलों में पिछले पांच सालों में स्कूल छोड़ने वाले छात्रों की दर में भारी उछाल आया है। यह खुलासा हाल ही में संसद में पेश किए गए सरकारी आंकड़ों से हुआ है, जिसने शिक्षा विभाग में हड़कंप मचा दिया है। यूपीएससी टॉपर और चर्चित आईएएस टीना डाबी पिछले कई सालों से रेगिस्तानी जिलों की कमान संभाल रही हैं। वह बाड़मेर जिले की कलेक्टर हैं और इससे पहले जैसलमेर में अपनी सेवाएं दे चुकी हैं, लेकिन उसके बाद भी मौजूदा स्थिति चौंकाने वाली है।प्राइमरी से आगे नहीं बढ़ पा रहे कदमलोकसभा में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान द्वारा पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, इन दोनों जिलों में प्राइमरी और सेकेंडरी स्तर के बीच 26.4% छात्रों ने स्कूल को अलविदा कह दिया। सबसे चिंताजनक स्थिति जैसलमेर की है, जहां कुल ड्रॉपआउट दर 30.9% तक पहुंच गई है। इसमें सेकेंडरी लेवल पर शिक्षा छोड़ने वालों का प्रतिशत 15.3% है। वहीं, बाड़मेर में यह दर 21.3% दर्ज की गई है।सिर्फ गरीबी नहीं, सुविधाओं का 'अकाल' है जिम्मेदारबाड़मेर के सांसद ने इन आंकड़ों का हवाला देते हुए जमीनी हकीकत बयां की। उन्होंने तर्क दिया कि सिर्फ गरीबी को दोष देना गलत होगा। असल समस्या खराब इंफ्रास्ट्रक्चर और शिक्षकों की भारी कमी है। कई स्कूलों के पास न तो अपनी इमारत है, न शौचालय और न ही पीने के पानी की उचित व्यवस्था। इसके अलावा, रेगिस्तानी इलाकों में स्कूलों की दूरी और ट्रांसपोर्ट सुविधा का न होना भी बड़े कारण हैं। जब छात्र प्राइमरी से मिडिल या सेकेंडरी स्कूल की ओर बढ़ता है, तो स्कूल की दूरी बढ़ जाती है, और पर्याप्त सहयोग न मिलने के कारण वह बीच में ही पढ़ाई छोड़ देता है।उजड़ते भविष्य की चुनौतीउच्च स्तर पर ड्रॉपआउट दर का तेजी से बढ़ना यह दिखाता है कि सीमावर्ती इलाकों में शिक्षा का सपोर्ट सिस्टम पूरी तरह चरमरा गया है। अगर समय रहते बुनियादी ढांचा नहीं सुधारा गया, तो रेगिस्तान के इन बच्चों का भविष्य अंधेरे में डूब सकता है।
राजस्थान के रेगिस्तानी जिलों में पढ़ाई छोड़ने की दर खतरनाकः शिक्षा में संकट
Navbharat Times•
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