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विवाद के बीच भाजपा ने राष्ट्रीय लोक मोर्चा नेता के बेटे को एमएलसी के रूप में नामित किया

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विवाद के बीच भाजपा ने राष्ट्रीय लोक मोर्चा नेता के बेटे को एमएलसी के रूप में नामित किया
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सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से पहले राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश विधान परिषद के सदस्य बन गए हैं। कोर्ट में फजीहत से बचने के लिए 31 जुलाई को BJP ने अपने MLC देवेश कुमार से इस्तीफा दिलवाया। उसके बाद 5 अगस्त को राज्यपाल सैयद अता हसनैन ने दीपक प्रकाश को MLC मनोनीत कर दिया। अगर ऐसा नहीं होता तो उनकी मंत्री पद से बर्खास्तगी तय मानी जा रही थी। …तो क्या MLC बन जाने से अब दीपक प्रकाश की कुर्सी बच गई, सुप्रीम कोर्ट अब क्या करेगा, समझेंगे; बूझे की नाही में...। सीनियर BJP लीडर राकेश कुमार सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर कर संविधान के ऑर्टिकल 164(4) के तहत बिहार सरकार के पंयाचती राज मंत्री दीपक प्रकाश की पुनर्नियुक्ति को अवैध बताया है। उनका तर्क है कि एक ही विधानसभा के कार्यकाल के भीतर सिर्फ सरकार या मुख्यमंत्री बदलने का बहाना बनाकर किसी गैर-विधायक को दोबारा 6 महीने की छूट देकर मंत्री नहीं बनाया जा सकता। याचिका में कहा गया है कि पहली बार मंत्री बनने के बाद से बिना चुनाव जीते मंत्री रहने की जो 6 महीने की तय अवधि है, वह 20 मई 2026 को ही समाप्त हो चुकी है। याचिका के मुताबिक, सरकार बदलने, इस्तीफा देने या मंत्रिमंडल के पुनर्गठन का सहारा लेकर 6 महीने की समय-सीमा को 'रीसेट' (शुरू से शुरू) नहीं किया जा सकता। याचिका में दीपक प्रकाश को बर्खास्त करने और 20 मई के बाद लिए गए फैसलों को रद्द करने की मांग की गई है। 15 जून 2026 को पहली बार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इसमें याचिकाकर्ता राकेश सिंह की तरफ से सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने अपनी बात रखी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना ने बिहार सरकार, दीपक प्रकाश और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर 4 सप्ताह में जवाब मांगा। हमने यही सवाल कानून मामलों के 3 जानकारों से पूछा। सिलसिलेवार तरीके से जानिए… कानून मामलों के जानकार प्रो. राजीव रंजन कहते हैं... याचिका दायर करने वाले BJP लीडर राकेश सिंह कहते हैं... 2001 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक केस में ऐतिहासिक फैसला दिया था। याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह ने उस फैसले का जिक्र इस केस में भी किया है। अगर सुप्रीम कोर्ट 2001 वाले अपने एसआर चौधरी फैसले की कड़ाई से व्याख्या करता है तो दीपक प्रकाश की पुनर्नियुक्ति को 'असंवैधानिक और शून्य' घोषित किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट में लंबी सुनवाई चली और 17 अगस्त 2001 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में पंजाब सरकार के इस कदम को असंवैधानिक ठहराया और फटकार लगाई। सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ (तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डॉ. ए.एस. आनंद, जस्टिस आर.सी. लाहोटी और जस्टिस के.जी. बालकृष्णन) ने कहा…

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