एजुकेशन सिस्टम और इससे जुड़ी कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में आती हैं, जिन पर सुनवाई भी होती है और फिर छात्रों के हितों में फैसले भी सुनाए जाते हैं. इसी क्रम में अब लॉ पढ़ने वाले छात्रों को लेकर एक याचिका सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम अपने विचार थोप नहीं सकते हैं. एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय की तरफ से ये याचिका दायर की गई थी, जिसमें कहा गया था कि कानून की पढ़ाई के सिलेबस को लेकर रिव्यू होना चाहिए और एक आयोग का गठन भी किया जाना चाहिए. इसमें 12वीं के बाद 5 साल की बजाय LLB को 4 साल का करने की मांग की गई थी. इस पूरे मामले को लेकर हमने सुप्रीम कोर्ट के वकीलों और LLB कर रहे कुछ छात्रों से बातचीत की, जिसमें उन्होंने बताया कि इससे क्या फायदा और क्या नुकसान हो सकता है.ऐसे हुई कानूनी पढ़ाई की शुरुआतसुप्रीम कोर्ट के वकील और कानूनी मामलों के लेखक विराग गुप्ता ने इस मामले को लेकर विस्तार में जानकारी दी. उन्होंने बताया कि कैसे पहले कानून की पढ़ाई दो साल की होती थी और बाद में इसे बढ़ाया गया. विराग गुप्ता ने कहा, भारत में लॉ की पढ़ाई और वकालत के प्रोफेशन के बारे में संसद ने Advocates Act, 1961 बनाया था. उसके अनुसार Bar Council of India Rules, 1975 बनाए गए हैं. कानून की पढ़ाई से जुड़े नियमों का पालन कराने के लिए बार काउसिंल ऑफ इंडिया को नियामक अधिकार हासिल हैं.परंपरागत तौर पर भारत में स्नातक छात्रों को ही कानून की शिक्षा हासिल करने का अधिकार था. शुरुआत में Law की पढ़ाई 2 साल की होती थी, जो बाद में 3 साल की हो गई. इंजीनियरिंग और मेडिकल जैसे कोर्स में 12वीं के बाद एडमिशन होता है, उसी तर्ज पर वकालत से योग्य युवाओं को जोड़ने के लिए कक्षा-12 के बाद पांच साल के इंटीग्रेटेड कोर्स की शुरुआत हुई. उसके अनुसार ज्यादातर राज्यों में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (NLU) की शुरुआत हुई, जहां पांच साल वाला LLB कोर्स शुरू हुआ.क्या होगा नुकसान?एडवोकेट विराग गुप्ता ने बताया कि सामान्य तौर पर 12वीं के बाद ग्रेजुएट और फिर लॉ करने वालों को छह साल का समय लगता है, लेकिन इंटीग्रेटेड दो साल के कोर्स में एक साल की छूट मिलती है. अगर इस कोर्स को 5 साल की बजाए 4 साल का किया गया तो स्नातक के बाद लॉ और इंटीग्रेटेड कोर्स के बीच में 2 साल का बड़ा फर्क आ जाएगा. ऐसी स्थिति में ग्रेजुएशन के बाद होने वाले लॉ कोर्स की अवधि को घटाकर तीन साल से कम करके दो साल करने की मांग हो सकती है. चार साल का कोर्स करने से कानून की पढ़ाई की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है. सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने वकालत के गिरते स्तर पर कई बार चिंता जाहिर की है.बाकी वकीलों ने क्या कहा?एनडीटीवी ने इस मसले को लेकर बाकी वकीलों से भी बातचीत की. सुप्रीम कोर्ट की वकील आरुषि कुलश्रेष्ठ ने इस मामले को लेकर कहा कि वर्तमान समय में कानूनी शिक्षा का उद्देश्य केवल सैद्धांतिक ज्ञान देना नहीं, बल्कि छात्रों को व्यावहारिक, रिसर्च बेस्ड और स्किल ओरिएंटेड बनाना होना चाहिए. अगर पाठ्यक्रम को सही तरह से बनाया जाए तो 4 साल में ही सभी जरूरी विषयों और कानूनों का गहन और प्रभावी अध्ययन कराया जा सकता है. इसमें इंटर्नशिप को अनिवार्य बनाना, समकालीन कानूनों पर ज्यादा ध्यान देना, मूट कोर्ट प्रतियोगिताएं, लीगल रिसर्च और ड्राफ्टिंग स्किल को प्राथमिकता दी जानी चाहिए.सुप्रीम कोर्ट के ही वकील अभिमन्यु कुमार कुमार ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के बाद भी पांच साल के कोर्स को बनाए रखना न तो शैक्षणिक रूप से उचित है और न ही व्यावहारिक रूप से जरूरी है. चार वर्षीय मॉडल न केवल शिक्षा प्रणाली के अनुरूप है, बल्कि अनावश्यक गैर-कानूनी विषयों को कम करते हुए विद्यार्थियों को जल्दी पेशे में आने का मौका देता है.वहीं एडवोकेट मुस्कान बैंस्ला ने भी एलएलबी को चार साल किए जाने की वकालत की. उन्होंने कहा कि जब दुनिया भर में शिक्षा का ढांचा बदल रहा है और वकालत के पेशे की जरूरतें भी अलग हो गई हैं, चार साल की LLB डिग्री पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है. कई देशों में लॉ की पढ़ाई चार साल की होती है, जिसमें तीन साल पढ़ाई और एक साल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग पर ध्यान दिया जाता है. नई शिक्षा नीति 2020 भी यह संकेत देती है कि प्रोफेशनल कोर्स चार साल के होने चाहिए, ताकि पढ़ाई ज्यादा फोकस्ड और काम की हो.LLB छात्रों का क्या कहना है?सुप्रीम कोर्ट के वकीलों के अलावा हमने उन छात्रों से भी बातचीत की, जो अभी कानून की पढ़ाई कर रहे हैं. प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी बैंगलोर से LLB कर रहे छात्र भान सिंह ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में दायर पीआईएल सही है. उन्होंने कहा, इसका मुख्य उद्देश्य पढ़ाई को छोटा करना नहीं, बल्कि उसे अधिक प्रभावी और व्यावहारिक बनाना है. मौजूदा 5 साल के कोर्स में कई विषय दोहराए जाते हैं. 4 साल का मॉडल इस दोहराव को खत्म कर छात्रों का एक साल बचा सकता है.लॉ स्टूडेंट भान सिंह ने बताया कि किताबी ज्ञान के बजाय इंटर्नशिप और मूट कोर्ट जैसी व्यावहारिक शिक्षा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि कोर्स का ड्यूरेशन कम होने से ट्यूशन फीस और रहने का खर्च घटेगा. साथ ही छात्र एक साल पहले प्रोफेशनल दुनिया में कदम रख पाएंगे, जिससे उन्हें अनुभव हासिल करने का अधिक समय मिलेगा.इन चीजों को बदलने की जरूरतइसी यूनिवर्सिटी से LLB की फाइनल ईयर की स्टूडेंट चंद्रिका कृष्णा का तर्क कोर्स का ड्यूरेशन कम करने के पक्ष में नहीं है. उन्होंने कहा कि कानून की पढ़ाई की अवधि कम करना सुधार नहीं बल्कि एक समझौता है. कानून की पढ़ाई के लिए मानसिक परिपक्वता और गहराई की जरूरत होती है. समय कम करने से छात्र केवल रट्टा मारेंगे, उनकी समझ विकसित नहीं होगी. उन्होंने कहा कि समस्या कोर्स की 'अवधि' में नहीं, बल्कि 'डिजाइन' में है. दोहराव और पुरानी शिक्षण पद्धति को बदलने की जरूरत है, साल कम करने की नहीं. 4 साल के मॉडल में इंटर्नशिप और रिसर्च के लिए समय और भी कम हो जाएगा, जिससे छात्र कोर्ट की कार्यवाही के लिए तैयार नहीं हो पाएंगे.EXCLUSIVE: युद्ध के कारण यूनिवर्सिटीज में पढ़ाई पर फिलहाल कोई असर नहीं, ईरान से लौटे छात्र ने बताई वजह
सुप्रीम कोर्ट ने कानून के पाठ्यक्रम में बदलाव की याचिका पर सुनवाई से किया इनकार
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