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सुप्रीम कोर्ट ने विरोध प्रदर्शन के दौरान छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई पर मामले की सुनवाई की

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सुप्रीम कोर्ट ने विरोध प्रदर्शन के दौरान छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई पर मामले की सुनवाई की
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नीट प्रोटेस्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट से सख्ती अपनाई है. प्रदर्शन के दौरान कई छात्रों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी. दिल्ली और दूसरे राज्यों में छात्रों के प्रदर्शन पर कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है- 'देखना होगा कि कितने एफआईआर हैं. उनमें से कितने ऐसे लोगों पर है जिनका आपराधिक इतिहास रहा है.' - हमने याचिकाकर्ताओं से भी बात की है. हम छात्रों पर कार्रवाई नहीं चाहते. इसके लिए जरूरी कदम उठाए जाएंगे. लेकिन छात्रों के बीच जो अपराधी तत्व घुस आए थे, उन्हें राहत नहीं दी जा सकती. यह देखना होगा कि कितने एफआईआर हैं. उनमें से कितने ऐसे लोगों पर है जिनका आपराधिक इतिहास रहा है. यह भी देखना होगा कि मामले बंद करने के लिए क्या प्रक्रिया होगी. हर मामले में पब्लिक प्रॉसिक्यूटर क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करें, यह एक लंबी प्रक्रिया होगी. हमारा जवाब तैयार है. लेकिन मैं खुद उसे पढ़ नहीं पाया हूं, थोड़ा समय दें. (सुनवाई 2-3 दिन टालने का अनुरोध) सरकार के हलफनामे में इन बातों का भी जवाब होना चाहिए कि वहां इतना बलप्रयोग क्यों किया गया. वहां बिना वर्दी के लोग कौन थे जो लाठी चला रहे थे. कुछ लोगों पर साधारण अपराध के मामले हैं. कुछ पर राजनीतिक कारणों से मुकदमे हैं. छोटे अपराध वालों को निशाना न बनाया जाए. हमने 2738 लोगों की जानकारी दी है. उनके खिलाफ गंभीर मुकदमे दर्ज हैं. सरकार ने बताया है कि मुकदमे वापस लेने या बंद करने के लिए कदम उठाए जाएंगे. लेकिन गंभीर अपराध में शामिल लोगों को राहत नहीं मिलेगी केतली को गर्म बनाए रखने का प्रयास न हो. पूर्व चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में कमिटी बने. अभी हम नाम तय नहीं कर पाए हैं. हमारे विचार में पूर्व जज का होना काफी होगा. पूर्व CJI जरूरी नहीं. यह बताया जाए कि इन्होंने 2 हजार से ज्यादा लोगों की पहचान की. फेस रिकॉग्निशन, आधार डेटा का इस्तेमाल गैरकानूनी है. हमने फेस रिकॉग्निशन के अलावा फील्ड वेरिफिकेशन भी किया है. एकतरफा सुनवाई नहीं हो सकती. वहां महिला पुलिस अधिकारियों से दुर्व्यवहार हुआ. भीड़ की तरफ खींचा गया. छात्रों की आड़ में छुप रहे अपराधी रियायत के हकदार नहीं हैं, यह भ्रम भी नहीं होना चाहिए कि अगर किसी पुलिस अधिकारी ने ज़्यादती की है, तो उन्हें संरक्षण दिया जाएगा. 19 अगस्त को अगली सुनवाई होगी. कमिटी के गठन और उसके कार्यक्षेत्र और प्रोटोकॉल पर भी विचार होगा. सभी पक्ष अपना जवाब दाखिल करें.

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