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समाजवादी पार्टी ने 2027 के चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश में दलित मतदाताओं तक पहुंच का विस्तार किया

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समाजवादी पार्टी ने 2027 के चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश में दलित मतदाताओं तक पहुंच का विस्तार किया
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उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोट बैंक को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है. कभी बहुजन समाज पार्टी का मजबूत आधार रहे दलित वोटरों को अपने पाले में लाने के लिए समाजवादी पार्टी लगातार आउटरीच बढ़ा रही है. अखिलेश यादव की रणनीति अब केवल MY यानी मुस्लिम-यादव समीकरण तक सीमित नहीं दिख रही, बल्कि PDA के जरिए दलित वोटरों तक भी पहुंच बनाने की कोशिश हो रही है. मायावती के उत्तराधिकारी को लेकर समय-समय पर सामने आ रही चर्चाओं और पार्टी के भीतर बदलावों के बीच विपक्षी दल बसपा के कमजोर होते जनाधार को अपने लिए संभावित अवसर के तौर पर देख रहे हैं. इसी बीच अखिलेश यादव ने योगी सरकार के कार्यकाल में प्रदेश में 151 स्थानों पर बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की मूर्तियां टूटने की रिपोर्ट जारी की है. अखिलेश यादव का कहना है कि समाजवादी पार्टी की सरकार बनने पर बाबा साहब की मूर्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी. बताते चलें कि अखिलेश यादव पिछले कुछ समय से दलित और बहुजन समाज के महापुरुषों को लेकर लगातार सक्रिय नजर आ रहे हैं. नीले पटके और नीली टी-शर्ट के जरिए भी उनकी राजनीतिक आउटरीच चर्चा में है. समाजवादी पार्टी इसे PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा बता रही है. समाजवादी पार्टी के नेता आमिक जमाई ने कहा कि 2019 में बसपा-सपा गठबंधन टूटने से दलित समाज में नाराजगी पैदा हुई थी. उनका दावा है कि 2022 और 2024 में दलित समाज के युवाओं का रुझान अखिलेश यादव की ओर बढ़ा है. उन्होंने कहा कि संविधान की रक्षा के लिए अखिलेश यादव ही संघर्ष कर रहे हैं और 2027 में दलित समाज का बड़ा हिस्सा समाजवादी पार्टी की ओर देख रहा है. वहीं कांग्रेस नेता सुरेंद्र राजपूत ने मायावती और बसपा के राजनीतिक प्रभाव को लेकर कहा कि बहुजन मिशन अब बीजेपी के खिलाफ और संविधान, आरक्षण तथा लोकतंत्र की रक्षा करने वालों के साथ है. उन्होंने दावा किया कि इंडिया गठबंधन दलित, आदिवासी, महिला, युवा और अल्पसंख्यक वर्ग से जुड़े मुद्दों को उठा रहा है. दूसरी तरफ यूपी सरकार में मंत्री दानिश आजाद अंसारी ने समाजवादी पार्टी के आरोपों को खारिज किया. उनका कहना है कि योगी सरकार के कार्यकाल में बाबा साहब आंबेडकर की मूर्तियां स्थापित करने का काम किया गया है. उन्होंने समाजवादी पार्टी पर दलितों के हितों को लेकर केवल राजनीति करने का आरोप लगाया और कहा कि अगर सपा नेताओं को वास्तव में चिंता है तो उन्हें अपने क्षेत्रों में आंबेडकर की प्रतिमा स्थापित कराने के प्रस्ताव देने चाहिए थे. इस पूरी सियासी कवायद के बीच सवाल यही है कि क्या बसपा के कमजोर होते जनाधार का फायदा समाजवादी पार्टी उठा पाएगी? या फिर दलित वोटर 2027 में अलग-अलग दलों के बीच अपना नया राजनीतिक विकल्प तलाशेगा? वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेंद्र शुक्ला के मुताबिक, 90 के दशक में अंबेडकर, कांशीराम और बहुजन आंदोलन उत्तर प्रदेश की राजनीति के केंद्र में थे. अब बसपा के कमजोर होने के बाद दलित वोटरों के बीच यह विमर्श चल रहा है कि उनका राजनीतिक रुख किस ओर जाए. उनके मुताबिक अखिलेश यादव अपने पारंपरिक MY समीकरण से आगे बढ़कर PDA के जरिए दलित वोटरों के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं और आंबेडकर तथा दलित चेतना से जुड़े मुद्दों पर उनकी सक्रियता इसी रणनीति का हिस्सा है.

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Publisher: ABP News

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