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Aug 7, 2026, 12:53 PM
हाथिन में आई. टी. आई. में दाखिले के लिए तीसरी मेरिट सूची जारी

हाथिन में आई. टी. आई. में दाखिले के लिए तीसरी मेरिट सूची जारी

हथीन। आईटीआई में दाखिले की प्रक्रिया के तीसरे चरण में शुक्रवार को तीसरी मेरिट सूची जारी कर दी गई। मेरिट सूची में नाम आने वाले अभ्यर्थी 12 अगस्त तक फीस जमा कर अपनी सीट सुनिश्चित कर सकेंगे। वहीं, 11 अगस्त तक दस्तावेजों का सत्यापन भी किया जाएगा। इसके बाद खाली सीटों के लिए अगले चरण में काउंसलिंग होगी।पहले और दूसरे चरण में अब भी बड़ी संख्या में सीटें खाली हैं। संस्थान के अनुसार, इन्हें आगामी चरणों में भरने का प्रयास किया जाएगा। तीसरे चरण के बाद 14 अगस्त को सभी संस्थानों में रिक्त सीटों की सूची जारी की जाएगी। इसके आधार पर छात्रों को ट्रेड और संस्थान बदलने का मौका मिलेगा। 14 से 16 अगस्त तक पोर्टल पर संशोधन कर सकेंगे। इसके बाद 18 अगस्त को चौथे चरण की मेरिट सूची जारी होगी।विज्ञापनआईटीआई हथीन के इंचार्ज मनोहरलाल ने बताया कि अभ्यर्थियों को निर्धारित समय के भीतर दस्तावेजों का सत्यापन और फीस जमा करना जरूरी है। समय सीमा निकल जाने के बाद संबंधित सीट अगले चरण के लिए रिक्त मान ली जाएगी।
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Aug 7, 2026, 11:49 AM
रवि टम्टा का एयरबोर्न इलेक्ट्रिक वाहन प्रोटोटाइप उड़ान भरता है

रवि टम्टा का एयरबोर्न इलेक्ट्रिक वाहन प्रोटोटाइप उड़ान भरता है

पहाड़ के एक युवा ने तकनीक की दुनिया में नई पहल की है। अल्मोड़ा निवासी इनोवेटर रवि टम्टा ने हवा में उड़ने वाले इलेक्ट्रिक वाहन का प्रोटोटाइप तैयार किया है। यह वाहन बैटरी से संचालित होता है और हवा में उड़ान भरने में सक्षम है। रवि टम्टा के अनुसार उन्होंने अल्मोड़ा के आर्मी हेलीपैड में इसका सफल परीक्षण किया है। परीक्षण के दौरान वाहन के हवा में उड़ने का वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। रवि की इस उपलब्धि को लेकर स्थानीय लोगों में भी उत्सुकता है। उनका कहना है कि आने वाले समय में यह तकनीक पहाड़ी क्षेत्रों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। धौलादेवी विकासखंड के काफलीखान निवासी रवि टम्टा ने अपने बनाए हपिडा स्काईनेक्स फ्लाइंग व्हीकल प्रोटोटाइप के सफल परीक्षण का दावा किया है। कई वर्षों के शोध, डिजाइन और तकनीकी परीक्षण के बाद तैयार किए गए इस प्रोटोटाइप ने हवा में उड़ान भरी। रवि टम्टा ने बताया कि इस परियोजना पर वह लंबे समय से काम कर रहे थे। उनका उद्देश्य ऐसा व्यक्तिगत हवाई वाहन तैयार करना है, जो पूरी तरह इलेक्ट्रिक हो और भविष्य में लोगों के लिए हवाई यात्रा का एक नया विकल्प बन सके। रवि के अनुसार हपिडा स्काईनेक्स का परीक्षण परियोजना के लिए बड़ी उपलब्धि है।
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Aug 7, 2026, 09:54 AM
ए. आई.-जनित वायरस ने अभूतपूर्व शोध में बैक्टीरिया को सफलतापूर्वक मार डाला

ए. आई.-जनित वायरस ने अभूतपूर्व शोध में बैक्टीरिया को सफलतापूर्वक मार डाला

एआई से ऐप्स और वेबसाइट के बाद अब वायरस भी बनाए जाने लगे हैं. जी हां, बिल्कुल सही पढ़ा है आपने. रिसर्चर ने एआई की मदद से ऐसे वायरस तैयार कर लिए हैं, जो अभी से पहले कहीं मौजूद नहीं थे. इनमें से 16 वायरस तो बैक्टीरिया को मारने में भी कामयाब रहे. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी और कैलिफॉर्निया के आर्क इंस्टीट्यूट की एक टीम ने यह काम किया है. यह पहली बार हुआ है, जब किसी एआई मॉडल ने जीवित चीज के पूरा इंस्ट्रक्शनल मैनुअल लिखा है. राहत की बात यह है कि एआई से तैयार किए गए वायरस केवल बैक्टीरिया पर अटैक करते हैं और ये इंसानों, पशुओं और पौधों को नुकसान नहीं पहुंचा सकते. इस प्रोसेस में Evo 1 और Evo 2 नाम के एआई मॉडल्स इस्तेमाल किए गए और इनका काम करने का तरीका एआई चैटबॉट जैसा है. जैसे एआई चैटबॉट यह अंदाजा लगाते हैं कि अगला शब्द कौन-सा होगा, वैसे ही Evo यह पता लगाता है कि DNA की चैन में अगला केमिकल लेटर कौन-सा होगा. इस मॉडल में जेनेटिक कोड फीड करने की जरूरत होती है और यह DNA डिजाइन करना शुरू कर देता है. रिसर्च करने वाली टीम ने इस मॉडल को करोड़ों नैचुरल जिनोम पर ट्रेनिंग दी है और फिर इसे ΦX174 और उससे जुड़े वायरस पर फोकस कर दिया. इसके बाद Evo मॉडल ने हजारों पॉसिबल डिजाइन दिए, जिनमें से रिसर्चर ने 300 चुने और लैब में DNA को तैयार कर दिया. इस वायरस को एक खास तरह के बैक्टीरिया को इंफेक्ट करने के लिए बनाया गया है. रिसर्चर ने बताया कि एक सुबह उन्होंने देखा कि पेट्री डिश (कांच की एक प्लेट) पर ग्रो हो रहे बैक्टीरिया में क्लियर स्पॉट नजर आ रहे हैं. ऐसा तब होता है, जब वायरस उसे चबा रहा होता है. इस तरह के नए वायरस को बनाकर उन इंफेक्शन को ठीक किया जा सकता है, जो एंटीबायोटिक्स के प्रति रजिस्टेंट हो चुके हैं. यानी जो एंटीबायोटिक से ठीक नहीं हो रहे, उन इंफेक्शन को ठीक करने में ऐसे वायरस का इस्तेमाल किया जा सकता है. रिसर्चर ने इन वायरस को इंसानों के लिए पूरी तरह सुरक्षित बनाने की कोशिश की है. इसलिए इनकी ट्रेनिंग में कोई ऐसा डेटा शामिल नहीं किया गया, जो इंसानों के लिए खतरनाक हो. इसलिए इन मॉडल्स के लिए ह्यूमन पैथोजन जैसी कोई चीज एग्जिस्ट नहीं करती. इसके बावजूद नई खोज को लेकर चिंता भी जताई जा रही है. जानकारों का कहना है कि अब एआई की मदद से वायरस बनाने की कैपेबिलिटीज आ गई हैं, लेकिन इन्हें कंट्रोल करने के लिए कोई नियम नहीं है. एआई से वायरस बनाने को साइंस के फील्ड में एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है. इससे बीमारियों के इलाज ढूंढने की दिशा में काम तेज होने की उम्मीद जताई जा रही है. इसके साथ ही एक्सपर्ट ने चेतावनी दी है कि इससे नई सुरक्षा चिंताएं भी पैदा हो रही हैं. बता दें कि एआई की मदद से पहले ही मेडिसिन और एंटीबायोटिक्स के फील्ड में काफी काम हो रहा है और अब इस नई कामयाबी से इस काम की रफ्तार बढ़ने की उम्मीद है. अमेरिका ने पिछले हफ्ते ही एक नई पॉलिसी का ऐलान किया था, जिसमें बायोलॉजिकल एजेंट को खतरनाक बनाने पर रोक लगाई गई थी, लेकिन इसमें कंप्यूटर पर हुए काम को कोई जिक्र नहीं किया गया था. इस प्रोजेक्ट को उसी का फायदा मिला है. Evo मॉडल ओपन सोर्स है और इसे कोई भी डाउनलोड कर सकता है. इसी चीज ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है. दूसरी तरफ कई जानकार यह भी मानते हैं कि इसे लेकर चिंता की बात नहीं है. यह एक सबसे छोटा और आसान जिनोम है, जिसे कोई भी बना सकता है. हालांकि, वायरस बनाने वाली टीम का कहना है कि बड़े वायरस के लिए अभी काफी काम करने की जरूरत है, लेकिन इसे बनाना असंभव नहीं है. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन से पढ़ाई पूरी करने के बाद पिछले एक दशक से मीडिया इंडस्ट्री में सक्रिय हूं. फिलहाल एबीपी न्यूज के साथ काम कर रहा हूं और यहां टेक्नोलॉजी से जुड़ी खबरों, गैजेट्स, ऐप्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सोशल मीडिया और डिजिटल ट्रेंड्स पर लिख रहा हूं. फ्यूचर टेक, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और तेजी से बदलती डिजिटल दुनिया से जुड़े टॉपिक्स में विशेष रुचि है. पिछले 10 वर्षों में नेशनल, पॉलिटिक्स, इंटरनेशनल, ऑटो, बिजनेस और टेक समेत कई बीट्स पर काम करने का अनुभव रहा है. इस दौरान टाइम्स इंटरनेट, दैनिक जागरण और न्यूजबाइट्स जैसे कई मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला. विभिन्न बीट्स पर काम करने के अनुभव ने खबरों को अलग-अलग नजरिए से समझने और पेश करने की समझ दी. रिपोर्टिंग और कंटेंट लिखने के दौरान हमेशा कोशिश रही कि खबरों को आसान और भरोसेमंद तरीके से रीडर तक पहुंचाया जाए. 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान ग्राउंड रिपोर्टिंग करने और कई नेताओं के इंटरव्यू लेने का भी अवसर मिला. काम के सिलसिले में कई बड़े कार्यक्रमों, प्रेस कॉन्फ्रेंस और विशेष आयोजनों को कवर करने का मौका मिला, जहां अलग-अलग पहलुओं को समझने का अवसर मिला. डिजिटल मीडिया के लगातार बदलते दौर में नई चीजें सीखने और खुद को अपडेट रखने की कोशिश रहती है, ताकि कंटेंट को बेहतर और रीडर के समझने के लिए आसान बनाया जा सके.
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Aug 7, 2026, 07:02 AM
गूगल एआई कोडिंग स्टार्टअप सौदे में 1.50 करोड़ डॉलर से अधिक के लिए मैकेनाइज का अधिग्रहण करने के लिए तैयार है

गूगल एआई कोडिंग स्टार्टअप सौदे में 1.50 करोड़ डॉलर से अधिक के लिए मैकेनाइज का अधिग्रहण करने के लिए तैयार है

AI की दुनिया में हर कुछ समय में अलग ही देखने को मिल रहा है. कभी नए मॉडल्स की लड़ाई तो कभी AI से कोडिंग करवाने का कंपटीशन. अब सबसे बड़ी लड़ाई ऐसे AI टूल्स की है जो खुद कोड लिख सकें, ऐप बना सकें और सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट का बड़ा हिस्सा अपने आप कर सकें. इसी रेस में आगे निकलने के लिए गूगल अब एक छोटी AI स्टार्टअप पर बड़ा दांव लगाने की तैयारी में है. बता दें कि ये स्टार्टअप पिछले साल यानी 2025 में ही बना था. रिपोर्ट्स के मुताबिक Google, अमेरिका की AI कोडिंग स्टार्टअप Mechanize के साथ 1.5 अरब डॉलर यानी करीब 13,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की डील पर बातचीत कर रहा है. कुछ रिपोर्ट्स में 2 बिलियन डॉलर्स की भी बात है. दिलचस्प बात यह है कि इस स्टार्टअप में सिर्फ करीब 35 कर्मचारी हैं. इसके बावजूद गूगल इतनी बड़ी रकम खर्च करने को तैयार है. दरअसल यह कोई सीधा अधिग्रहण नहीं होगा. रिपोर्ट के मुताबिक गूगल स्टार्टअप की AI तकनीक का लाइसेंस लेना चाहता है और साथ ही उसके कई इंजीनियरों को गूगल DeepMind में शामिल करना चाहता है. यानी कंपनी के लिए सबसे बड़ी चीज उसका प्रोडक्ट नहीं, बल्कि वहां काम करने वाले AI एक्सपर्ट्स हैं. Mechanize की शुरुआत 2025 में हुई थी. कंपनी AI कोडिंग एजेंट पर काम करती है. इसका मकसद ऐसा AI तैयार करना है जो इंसानों की तरह सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग के कई काम खुद कर सके. कंपनी के CEO तमय बेसिरोग्लू इससे पहले AI रिसर्च संस्था Epoch AI के को-फाउंडर रह चुके हैं. स्टार्टअप ने अब तक करीब 9.1 मिलियन डॉलर की फंडिंग जुटाई है और पिछली फंडिंग के दौरान इसकी वैल्यू करीब 500 मिलियन डॉलर आंकी गई थी. Google को इसकी जरूरत क्यों पड़ रही है? पिछले एक साल में AI कोडिंग टूल्स की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है. OpenAI का Codex, Anthropic का Claude, Cursor, Devin और दूसरे AI टूल्स अब डेवलपर्स के बीच तेजी से इस्तेमाल हो रहे हैं. गूगल का जेमेनाई भी कोडिंग करता है, लेकिन कई डेवलपर्स अभी भी दूसरे प्लेटफॉर्म को ज्यादा पसंद करते हैं. ऐसे में गूगल अपनी कोडिंग क्षमता को तेजी से बेहतर करना चाहता है. दरअसल गूगल पिछले कुछ महीनों से AI टैलेंट रेस में काफी आक्रामक नजर आ रहा है. कुछ ही समय पहले कंपनी ने विंडसर्फ के CEO वरुण मोहन और को फाउंडर डगलस चेन और कई रिसर्चर्स को अपने DeepMind डिविजन में शामिल किया था. उस डील में भी गूगल ने कंपनी को पूरी तरह नहीं खरीदा था, बल्कि उसकी तकनीक का लाइसेंस लिया और प्रमुख इंजीनियरों को अपने साथ जोड़ लिया था. सिर्फ तकनीक नहीं, टैलेंट भी खरीद रही हैं कंपनियां AI इंडस्ट्री में अब सबसे बड़ी कमी कंप्यूटर या पैसा नहीं, बल्कि बेहतरीन AI इंजीनियरों की है. यही वजह है कि Meta, Google, OpenAI, Microsoft और एंथ्रॉपिक जैसी कंपनियां छोटे-छोटे स्टार्टअप्स से सीधे टैलेंट अपने साथ जोड़ रही हैं. कई बार कंपनी को पूरी तरह खरीदने की बजाय उसके इंजीनियरों को हायर करना ज्यादा आसान और तेज माना जा रहा है. इससे नियामकीय जांच की संभावना भी कम रहती है. AI Coding Agent क्या होता है? AI Coding Agent ऐसा सिस्टम होता है जो सिर्फ कोड का सजेशन नहीं देता, बल्कि पूरा प्रोजेक्ट समझकर अपने आप कोड लिख सकता है, बग ठीक कर सकता है, टेस्ट चला सकता है और कई मामलों में ऐप तैयार करने में भी मदद करता है. आने वाले समय में माना जा रहा है कि सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट का बड़ा हिस्सा ऐसे AI एजेंट संभाल सकते हैं. यही वजह है कि दुनिया की लगभग हर बड़ी टेक कंपनी इस तकनीक पर अरबों डॉलर खर्च कर रही है. Google और Mechanize ने फिलहाल इस पोंटेशियल डील पर आधिकारिक तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की है. लेकिन अगर यह समझौता पूरा होता है, तो यह AI कोडिंग सेक्टर की सबसे बड़ी डील्स में से एक होगी.
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Aug 7, 2026, 05:23 AM
छात्र ने प्रयोग में चींटियों के दृश्य नौवहन कौशल की खोज की

छात्र ने प्रयोग में चींटियों के दृश्य नौवहन कौशल की खोज की

हममें से अधिकतर लोगों ने चींटियों को एक दूसरे के पीछे सीधी लाइन में चलते देखा होगा, लेकिन शायद ही हमने कभी इन्हें ज्यादा तवज्जो देने के बारे में सोचा हो. लेकिन सियुंगाह चुंग ने इन चींटियों में कुछ अलग पाया. उनके दिमाग में ये बात पता नहीं कहां से घर कर गई कि आखिर एक पिनहेड से भी छोटे दिमाग वाली ये चींटियां अपना भोजन कैसे ढूंढती हैं और फिर बिना लापता हुए कैसे अपने घर में वापस पहुंच जाती हैं. इस सवाल का जवाब जानने के लिए कैलिफोर्निया के बेवेरली विस्टा मिडिल स्कूल की आठवीं कक्षा की इस स्टूडेंट ने 200 रेड हार्वेस्टर चींटिंयों पर एक एक्सपेरिमेंट कर डाला. सोसायटी फॉर साइंस के मुताबिक उन्होंने रिसर्च में पाया कि रेड हार्वेस्टर चींटियां भटकती हुई अपनी मंजिल तक नहीं पहुंचती बल्कि दृश्य संकेतों पर निर्भर करती हैं जो उन्हें उनकी मंजिल तक पहुंचने में गाइड करता है. इस एक्सपेरिमेंट ने सियुंगाह को थर्मो फिशर साइंटिफिक जूनियर इनोवेटर्स चैलेंज 2025 की फाइनलिस्टों में जगह दिलवाया. यह यूएस के सेकेंडरी क्लासेस में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स के लिए देश का बड़ा STEM कॉम्पिटीशन है. अपनी दैनिक दिनचर्या में सियुंगाह के मन में चींटियों को लेकर दिलचस्पी जागी. चींटियों को एक सीधी लाइन में चलते पाकर उनके मन में यह बात आई कि आखिर पर्दे के पीछे चल क्या रहा है. वैज्ञानिक लंबे समय से यह मानते रहे हैं कि चींटियां जब चलती हैं तो वे अपने पीछे कैमिकल छोड़ती हैं जिसे फॉलो करके दूसरी चींटियां भी उनके पीछे-पीछे चलती है, लेकिन सियुंगाह यह जानना चाहती थीं कि आखिर पूरी कहानी क्या है. क्या कीड़े-मकौड़े अपने आसपास की चीजों को पहचानते हैं और उसे गाइड की तरह इस्तेमाल करते हैं? इस सवाल का जवाब पाने के लिए सियुंगाह ने पुराने स्टडी पर भरोसा जताने के बजाए एक नया एक्सपेरिमेंट करने की सोची. इस एक्सपेरिमेंट के लिए सियुंगाह ने 200 रेड हार्वेस्टर चींटियां चुनी. इन चीटियों का वैज्ञानिक नाम Pogonomyrmex barbatus है. सियुंगाह ने इनमें से 15 चींटियों को T शेप के भूलभुलैया वाले उपकरण में डाला. इसका रास्ता खाली नहीं था और रास्ते में कुछ आर्टिफिशियल लैंडमार्क बनाए गए थे. इसमें नकली पत्ते, पत्थर और रंग-बिरंगे बिल्डिंग ब्लॉक शामिल थे. ये चीजें चींटियों के लिए अपने खाने तक पहुंचने के रास्ते में दृथ्य संकेतों का काम कर सकती थीं. चींटियों को इस उपकरण को एक्सप्लोर करने और रास्तों को पहचानने का पूरा समय दिया गया. इस एक्सपेरिमेंट को कई और चींटियों के साथ दोहराया गया जिससे चीटिंयों के असल व्यवहार का पता लगाया जा सके. अगर चींटियों को बस दाएं-बाएं मुड़ने का क्रम याद होता, तो इस बदलाव से कोई फर्क नहीं पड़ता. उन्हें बिना किसी खास कठिनाई के अपने भोजन तक पहुंच जाना चाहिए था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. कुछ चींटिंया तुरंत दिशाभ्रमित हो गईं और कुछ चीटिंयां तो भोजन के जगह पर होने के बावजूद भी गलत रास्ते पर चली गईं. उनके व्यवहार में आए बदलाव से पता चलता है कि कीट अपने रास्तों को याद करने के बजाय आसपास की जगहों पर निर्भर होकर अपना मार्गदर्शन कर रहे थे. इस एक्सपेरिमेंट से यह सबूत मिला कि विजुअल लैंडमार्क ही चींटियों को अपने वातावरण को नेटिगेट करने में मदद करता है. भले ही यह एक्सपेरिमेंट बस चींटियों पर केंद्रित रही हो लेकिन इसका महत्व कीटों की दुनिया में कहीं बड़ा है. लंबे समय तक वैज्ञानिकों को ये बात आकर्षित करती रही कि छोटे दिमाग वाले जीव नेविगेशन, टीम वर्क और समस्याओं का समाधान निकालने के कठिन कामों को कैसे अंजाम देते हैं. चींटियों के अपने वातावरण में घूमने के लिए अपनाई जा रही स्ट्रैटजी को समझने से वैज्ञानिकों को अनजान जगहों में नेविगेट में सक्षम अधिक बुद्धिमान रोबोट और स्वायत्त मशीनों को डिजाइन करने में मदद मिल सकती है.
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Aug 7, 2026, 04:40 AM
स्मार्टफोन अब नई मुद्रण प्रणाली से नकली वस्तुओं की पहचान कर सकते हैं

स्मार्टफोन अब नई मुद्रण प्रणाली से नकली वस्तुओं की पहचान कर सकते हैं

दुनियाभर में नकली प्रोडक्ट्स की हजारों करोड़ रुपये की मार्केट है और इसका साइज कुल ग्लोबल ट्रेड का लगभग 2 प्रतिशत है. नकली प्रोडक्ट्स के कारण कंपनियों के साथ-साथ ग्राहकों को भी भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है. दूसरी तरफ नकली प्रोडक्ट्स बनाने वाले लगातार एडवांस होते जा रहे हैं और अब ऐसे सामान को पहचान पाना काफी मुश्किल हो गया है. इस कारण कंपनियां महंगी कीमत वाले ऑथेंटिकेशन सिस्टम पर डिपेंड रहती हैं. ऐसे सिस्टम के लिए खास स्कैनर या प्रोपराइटरी हार्डवेयर की जरूरत पड़ती है. इस मुश्किल को दूर करने के लिए रिसर्चर ने एक नया तरीका निकाला है. उनका मानना है कि अब केवल स्मार्टफोन के जरिए ही नकली सामान की पहचान की जा सकती है. आइए जानते हैं कि यह कैसे संभव होगा? रिसर्चर ने एक नया प्रिंटिंग सिस्टम तैयार किया है, जो रिस्पॉन्सिव एंटी-काउंटरफिट लेबल तैयार करेगा. ये लेबल ज्यादा मजबूत होंगे और इन्हें बड़ी संख्या में तैयार करना आसान होगा. रिस्पॉन्सिव होने के कारण इन्हें फोन से स्कैन भी किया जा सकेगा. इसकी खास बात यह है कि यह पूरी प्रोसेस बहुत आसान और किफायती होने वाली है. अगर ऐसे लेबल के लिए महंगे इक्विपमेंट की जरूरत पड़े तो इसे ज्यादा लोग और कंपनियां इस्तेमाल नहीं कर पाएंगी. दूसरी तरफ इन लेबल को स्मार्टफोन से ही स्कैन किया जा सकता है, जिससे ग्राहकों और रिटेलर्स के लिए सामान की पहचान करना एकदम आसान हो जाएगा. नया प्रिंटिंग सिस्टम कोई सामान्य लेबल तैयार नहीं करेगा. इसके अंदर तीन टेक्नोलॉजी का कॉम्बिनेशन काम करेगा. इसके लिए रिसर्चर ने टेंपरेचर और लाइट रिस्पॉन्सिव माइक्रोकैप्सूल तैयार किए हैं, जिन्हें हाई-स्पीड प्रिंटिंग के लिए UV इंक के साथ फॉर्मूलेट किया गया है. लेबल की ऑथेंटिसिटी को वेरिफाई करने के लिए एक पोर्टेबल स्मार्टफोन-बेस्ड डिटेक्शन सिस्टम भी बनाया गया है. अभी कंपनियां अपने प्रोडक्ट्स को कॉपी होने से बचाने के लिए होलोग्राम, QR कोड्स और RFID-बेस्ड सिक्योरिटी फीचर्स की मदद ले रही है. इससे कंपनियों की लागत भी बढ़ती है और कई मामलों में उन्हें खास वेरिफिकेशन हार्डवेयर की जरूरत पड़ती है. अब नया सिस्टम स्मार्टफोन की मदद से ही वेरिफिकेशन की प्रोसेस को पूरा कर देगा. इसलिए कंपनियों को अलग से हार्डवेयर पर पैसा खर्च नहीं करना पड़ेगा. कंपनियों के साथ-साथ यह ग्राहकों के लिए भी काफी फायदेमंद होगा और वो बिना किसी झंझट के घर बैठे-बैठे अपने फोन की मदद से सामान के असली या नकली होने का पता लगा पाएंगे. रिसर्चर ने बताया कि इस टेक्नोलॉजी को कई पैकेजिंग इंडस्ट्री में इस्तेमाल किया जा सकता है. यह टेक्नोलॉजी डिप्लॉयमेंट के लिए तैयार है और कंपनियां इसे प्रोडक्शन लाइन में शामिल कर सकती है. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन से पढ़ाई पूरी करने के बाद पिछले एक दशक से मीडिया इंडस्ट्री में सक्रिय हूं. फिलहाल एबीपी न्यूज के साथ काम कर रहा हूं और यहां टेक्नोलॉजी से जुड़ी खबरों, गैजेट्स, ऐप्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सोशल मीडिया और डिजिटल ट्रेंड्स पर लिख रहा हूं. फ्यूचर टेक, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और तेजी से बदलती डिजिटल दुनिया से जुड़े टॉपिक्स में विशेष रुचि है. पिछले 10 वर्षों में नेशनल, पॉलिटिक्स, इंटरनेशनल, ऑटो, बिजनेस और टेक समेत कई बीट्स पर काम करने का अनुभव रहा है. इस दौरान टाइम्स इंटरनेट, दैनिक जागरण और न्यूजबाइट्स जैसे कई मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला. विभिन्न बीट्स पर काम करने के अनुभव ने खबरों को अलग-अलग नजरिए से समझने और पेश करने की समझ दी. रिपोर्टिंग और कंटेंट लिखने के दौरान हमेशा कोशिश रही कि खबरों को आसान और भरोसेमंद तरीके से रीडर तक पहुंचाया जाए. 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान ग्राउंड रिपोर्टिंग करने और कई नेताओं के इंटरव्यू लेने का भी अवसर मिला. काम के सिलसिले में कई बड़े कार्यक्रमों, प्रेस कॉन्फ्रेंस और विशेष आयोजनों को कवर करने का मौका मिला, जहां अलग-अलग पहलुओं को समझने का अवसर मिला. डिजिटल मीडिया के लगातार बदलते दौर में नई चीजें सीखने और खुद को अपडेट रखने की कोशिश रहती है, ताकि कंटेंट को बेहतर और रीडर के समझने के लिए आसान बनाया जा सके.
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Aug 7, 2026, 02:50 AM
उच्च-रिज़ॉल्यूशन छवियों में सूर्य की सतह का खुलासाः अभूतपूर्व खोजों से वैज्ञानिक स्तब्ध

उच्च-रिज़ॉल्यूशन छवियों में सूर्य की सतह का खुलासाः अभूतपूर्व खोजों से वैज्ञानिक स्तब्ध

साइंटिस्ट्स ने सूरज की सतह की अब तक की सबसे हाई-रिजॉल्यूशन तस्वीरें खींची हैं। ये तस्वीरें हवाई के माउई आइलैंड पर मौजूद डेनियल के. इनौये सोलर टेलीस्कोप से ली गईं। हवाई के माउई द्वीप पर मौजूद नेशनल साइंस फाउंडेशन के डैनियल के. इनौये सोलर टेलीस्कोप की मदद से सूरज की झुलसा देने वाली सतह को देख पाए। असल में ये तस्वीरें टेलीस्कोप टेस्ट करने के लिए ली गई थीं। लेकिन रिजल्ट देखकर वैज्ञानिक हैरान रह गए। तस्वीरों में सूरज की चमकदार सतह पर अजीब पंखों जैसे पैटर्न और प्लाज्मा की महीन संरचनाएं साफ दिख रही हैं, जो पहले कभी नहीं देखी गई थीं। रिसर्च नेचर जर्नल में पब्लिश हुई है। वैज्ञानिक डॉ. फ्रेडरिक वोगर के मुताबिक इससे सौर गतिविधियों और अंतरिक्ष के मौसम को बेहतर समझने में मदद मिलेगी। साथ ही ये राज भी सुलझ सकता है कि सूरज का बाहरी वायुमंडल कोरोना, सतह से लाखों डिग्री ज्यादा गर्म क्यों है। वैज्ञानिकों ने सूरज पर जो चीज खोजी है, उसे केल्विन-हेल्महोल्ट्ज इंस्टेबिलिटी (Kelvin-Helmholtz instability) कहा जाता है। यह घटना तब होती है जब फ्लुइड्स, इस मामले में गर्म गैसें, एक-दूसरे के ऊपर से गुजरती हैं और छोटी-छोटी हलचलें घूमते हुए भंवर का रूप ले लेती हैं। समुद्र में, इससे यह समझने में मदद मिलती है कि कैसे छोटी लहरें विशाल और शक्तिशाली लहरों में बदल जाती हैं। NSO के डॉ. फ्रेडरिक वोएगर ने बताया कि सूरज की सतह पर इसे खोजने से न सिर्फ स्पेस वेदर के पीछे की गतिविधियों को समझने में मदद मिली, बल्कि यह भी पता चला कि सूरज की सतह इतनी गर्म क्यों है। इससे पता चलता है कि एनर्जी ऊपर की ओर कैसे पहुंचती है। भारतीय रेलवे: अब प्वाइंट्समैन को न्यूनतम दो वर्ष की सेवा के बाद मिलेगी पदोन्नति, देशभर के 66,388 लोगों को होगा लाभ कोडरमा-रजौली फोर-लेन प्रोजेक्ट पर हाईकोर्ट का निर्देश; NHAI, झारखंड और बिहार सरकार मिलकर करें काम हरियाणा: गर्भवती पत्नी को बेरहमी से पीटा, पति को जमानत देते हुए कोर्ट ने कहा, 'शराब की लत छोड़कर परिवार संभालें' श्रावण मास में महाकाल के दर्शन: भारत के एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कथा और अद्भुत अनुष्ठान कांवड़ यात्रा: बस्ती-अयोध्या फोरलेन पर आज से 11 अगस्त तक वाहनों का आवागमन बंद हरियाणा में राइस मिलर्स को पिछले साल 30 जून तक का मिलेगा बोनस, एक्स्ट्रा चावल की खरीद के लिए केंद्र से बात करेगी सरकार उन्होंने कहा, जब ऊपरी परतों में काफी एनर्जी जमा हो जाती है, तो वह फ्लेयर या कोरोनल मास इजेक्शन के रूप में बाहर निकल सकती है। NSO के डॉ. डेविड बोबोल्ट्ज ने कहा कि स्पेस वेदर से बचाव के अलावा, सूरज अनोखी प्रयोगशाला है क्योंकि यह हमारा सबसे करीबी तारा है। इससे हमें फिजिक्स के बुनियादी नियम समझने में मदद मिलती है। आइंस्टीन की रिलेटिविटी का पहला सबूत भी सूरज ग्रहण से मिला था।इसलिए सिर्फ ज्ञान के लिए भी हमें सूरज पर ऐसे प्रयोग करते रहना चाहिए।
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Dainik Jagran
Aug 7, 2026, 01:17 AM
वैज्ञानिकों ने उपग्रह डेटा और रडार छवियों का उपयोग करके भारत के जोशीमठ में भूस्खलन का अध्ययन किया

वैज्ञानिकों ने उपग्रह डेटा और रडार छवियों का उपयोग करके भारत के जोशीमठ में भूस्खलन का अध्ययन किया

सरकारी मशीनरी जोशीमठ में भूधंसाव की चुनौती से जूझ रही है और अब उसी क्षेत्र में हेलंग और कल्पेश्वर की पहाड़ियों के धीमी चाल से खिसकने की बात सामने आई है। जिसे अध्ययन के रूप में 22 जुलाई 2026 को प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका फ्रंटियर्स इन अर्थ साइंस में प्रकाशित किया गया है। अध्ययन राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी), राउरकेला के विज्ञानी प्रोहेलिका दलाल और प्रो. भास्कर कुंडू ने किया है। जिसमें वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के निदेशक डा विनीत गहलोत ने जोशीमठ क्षेत्र में स्थापित 'जोश' निरंतर जीपीएस स्टेशन का टाइम सीरीज डेटा उपलब्ध कराया और अध्ययन के निष्कर्षों की पुष्टि हो गई। शोधकर्ताओं ने वर्ष 2017 से 2023 के बीच यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के सेंटिनल-1 उपग्रह से प्राप्त 314 रडार चित्रों का विश्लेषण किया। इंटरफेरोमेट्रिक सिंथेटिक अपर्चर रडार (इनसार) तकनीक की मदद से जमीन की सतह में मिलीमीटर से लेकर सेंटीमीटर स्तर तक होने वाले बदलाव मापे गए। इसके साथ वर्षा के आंकड़ों, ग्रेस उपग्रह से प्राप्त भूजल एवं जल भंडारण संबंधी जानकारी तथा लैंड सरफेस डिस्चार्ज माडल (एलएसडीएम) के आंकड़ों की भी तुलना की गई। अध्ययन में विज्ञनियों ने पाया कि हेलंग और कल्पेश्वर की ढलानें अपने-अपने नदी तंत्र की दिशा में धीरे-धीरे सरक रही हैं। हेलंग क्षेत्र का खिसकाव मुख्य रूप से अलकनंदा नदी की घाटी की ओर, जबकि कल्पेश्वर क्षेत्र का खिसकाव कल्पगंगा घाटी की ओर दर्ज किया गया। वर्ष 2017 से 2023 के बीच हेलंग में लगभग 40 सेंटीमीटर और कल्पेश्वर में करीब 20 सेंटीमीटर तक संचयी विस्थापन दर्ज किया गया। विज्ञानियों के अनुसार नदियों द्वारा ढलान के निचले हिस्से का लगातार कटाव, वर्षा और पहाड़ के भीतर जमा होने वाला पानी मिलकर इस धीमे लेकिन लगातार जारी खिसकाव को बढ़ा रहे हैं। विज्ञानियों के अनुसार हर भूस्खलन अचानक नहीं होता। कई पहाड़ियां वर्षों तक बेहद धीमी गति से खिसकती रहती हैं। इसे धीमा भूस्खलन कहा जाता है। इसकी शुरुआत में कोई बड़ा बदलाव दिखाई नहीं देता, लेकिन समय के साथ जमीन में दरारें पड़ने लगती हैं, भवन झुकने लगते हैं और सड़कें क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। यदि यह प्रक्रिया तेज हो जाए तो यही धीमा खिसकाव बड़े भूस्खलन का रूप ले सकता है। अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि जोशीमठ के साथ ही हेलंग और कल्पेश्वर क्षेत्रों में भूस्खलन का लगभग 12 महीने का नियमित चक्र पाया गया। मानसून के दौरान होने वाली वर्षा का पानी पहाड़ के भीतर रिसता है और चट्टानों तथा मिट्टी की परतों पर अतिरिक्त दबाव डालता है। यही दबाव पहाड़ी को धीरे-धीरे खिसकाने लगता है। वैज्ञानिकों ने स्पेक्ट्रल विश्लेषण के माध्यम से इस वार्षिक चक्र की पुष्टि की। अध्ययन में यह भी सामने आया कि वर्षा और भूस्खलन के बीच तत्काल संबंध नहीं होता। वर्षा का असर सतह पर होने वाले खिसकाव पर लगभग तुरंत दिखाई देता है। पहाड़ के भीतर पानी जमा होने में लगभग एक महीने का समय लगता है। गहराई में जमा पानी का प्रभाव भूस्खलन की गति पर दो से तीन महीने बाद स्पष्ट दिखाई देता है। यानी वर्षा समाप्त होने के बाद भी पहाड़ के भीतर पानी जमा रहता है और कई सप्ताह तक ढलानों को कमजोर करता रहता है। यही वजह है कि कई बार बड़े भूस्खलन भारी बारिश रुकने के काफी समय बाद भी हो जाते हैं। शोध में भूमि उपयोग में हुए बदलावों का भी विश्लेषण किया गया। इसके अनुसार 2000 से 2022 के बीच जोशीमठ, हेलंग और कल्पेश्वर क्षेत्र में निर्मित क्षेत्र लगभग 0.7 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 3 वर्ग किलोमीटर हो गया। वहीं, वन क्षेत्र 8.5 वर्ग किलोमीटर से घटकर 7.5 वर्ग किलोमीटर रह गया। विज्ञानियों ने पाया कि जहां वनस्पति कम हुई, वहां जमीन में विकृति भी अधिक दर्ज की गई। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि यह भूस्खलन का अकेला कारण नहीं है, बल्कि कई कारकों में से एक है।
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Amar Ujala
Aug 6, 2026, 11:47 PM
गूगल के विज्ञापन डिस्कवरी लूप ने ए. आई. के साथ अनुसंधान को गति दी

गूगल के विज्ञापन डिस्कवरी लूप ने ए. आई. के साथ अनुसंधान को गति दी

इसका मकसद एआई की मदद से वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग रिसर्च को तेज करना है। कंपनी ऐसे एआई सिस्टम तैयार करना चाहती है जो कई स्टेप वाले रिसर्च और इंजीनियरिंग के काम को काफी हद तक अपने आप पूरा कर सकें। यानी नई दवाएं खोजने, नई सामग्री विकसित करने, हार्डवेयर डिजाइन करने और दूसरे वैज्ञानिक कामों में एआई की मदद ली जा सके। दिलचस्प ये है कि गूगल भी इसमें इन्वेस्टर के तौर पर हिस्सेदारी रखेगा।विज्ञापनगूगल से जेफ डीन का जाना सबसे बड़ी खबर मानी जा रही है। उन्होंने 1999 में कंपनी जॉइन की थी। गूगल सर्च को बड़े स्तर पर चलाने वाली कई अहम तकनीकों को बनाने में उनका बड़ा योगदान रहा। उन्होंने गूगल ब्रेन की भी शुरुआत की और एआई रिसर्च को आगे बढ़ाया।विज्ञापनडिस्कवरी लूप वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग रिसर्च पर काम करेगी। इसके तहत कंपनी मौजूदा वैज्ञानिक रिसर्च पेपर्स को पढ़ेगी। इसके बाद वह उन क्षेत्रों की पहचान करेगी जहां नई खोज की संभावना है और एक नया वैज्ञानिक विचार या नई थ्योरी तैयार हो सकती है। विचार को साबित करने के लिए एआई खुद ही प्रयोग की रूपरेखा भी तैयार करेगा। कंप्यूटर विज्ञान में यह खुद कोड लिखेगा और वैज्ञानिक भाषा में खुद रोबोटिक आर्म्स को निर्देश देगा। यदि परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं आते, तो एआई अपनी गलती से सीखकर तुरंत नया हाइपोथिसिस बनाेगा और चक्र को दोबारा शुरू करेगा।भारतवंशी संजय घेमावत का जन्म 1966 में वेस्ट लाफायेट, इंडियाना (अमेरिका) में हुआ था। उस समय उनके पिता महीपाल वहां की पर्ड्यू यूनिवर्सिटी से पीएचडी की पढ़ाई कर रहे थे। पिता की पढ़ाई पूरी होने के बाद उनका परिवार कोटा (राजस्थान) लौट आया। कोटा से स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चले गए।nउन्होंने कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से 1987 में अपनी बैचलर डिग्री पूरी की और एमआईटी (मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) से 1990 में मास्टर्स और 1995 में कंप्यूटर साइंस में पीएचडी पूरी की। संजय ने कुछ समय डिजिटल इक्विपमेंट कॉर्पोरेशन की रिसर्च लैब में काम किया, जहां उनकी मुलाकात जेफ डीन से हुई और फिर 1999 में वे गूगल से जुड़े।यह बदलाव ऐसे समय पर हुआ है जब गूगल पहले से एआई टैलेंट को बचाए रखने की चुनौती का सामना कर रहा है। पिछले कुछ महीनों में नोआम शजीर, जॉन जंपर और दूसरे कई बड़े एआई रिसर्चर्स भी गूगल छोड़ चुके हैं या दूसरी कंपनियों में चले गए हैं। ऐसे में इन चार दिग्गजों का जाने से कंपनी के लिए समस्याएं और बढ़ जाएंगी।
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Amar Ujala
Aug 6, 2026, 09:11 PM
न्यूनतम आक्रामक प्रक्रिया रोगियों के लिए नई आशा प्रदान करती है

न्यूनतम आक्रामक प्रक्रिया रोगियों के लिए नई आशा प्रदान करती है

मरीज के गाल से छोटा सा ऊतक लेकर उसे पुणे की लैब भेजा गया, जहां दो सप्ताह में करीब 50 लाख सेल्स तैयार किए गए। इन्हें दूरबीन की मदद से सिकुड़ी नली पर लगाया गया। पूरी प्रक्रिया 15 से 20 मिनट में पूरी हुई और मरीज अगले ही दिन अस्पताल से घर चला गया। डॉ. वेद भास्कर ने बताया कि यह तकनीक चुनिंदा मरीजों के लिए कम चीरफाड़ वाला नया विकल्प है। इसकी सफलता दर 70 से 80 प्रतिशत तक है, जबकि दर्द कम होता है और मरीज जल्दी स्वस्थ हो जाता है।
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Aug 6, 2026, 05:27 PM
दिल्ली के मुख्यमंत्री ने सर्वोदय विद्यालय में अत्याधुनिक एसटीईएम नवाचार प्रयोगशाला का उद्घाटन किया

दिल्ली के मुख्यमंत्री ने सर्वोदय विद्यालय में अत्याधुनिक एसटीईएम नवाचार प्रयोगशाला का उद्घाटन किया

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने सर्वोदय विद्यालय, पीतमपुरा में नई स्टेम इनोवेशन लैब (STEM Innovation Lab) का उद्घाटन किया. इस अत्याधुनिक लैब के माध्यम से छात्रों को प्रयोगात्मक शिक्षा, रचनात्मक सोच और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी. इस अवसर पर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा, ''दिल्ली का हर स्टूडेंट बड़े सपने देखे और उन्हें साकार करने के लिए आधुनिक अवसर प्राप्त करे, यही दिल्ली सरकार की प्रतिबद्धता है.'' उन्होंने ये भी कहा कि सरकारी स्कूलों में विश्वस्तरीय शिक्षण सुविधाओं का विस्तार हमारी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में है, ताकि हर छात्र भविष्य की चुनौतियों और अवसरों के लिए तैयार हो सके. दिल्ली का हर विद्यार्थी बड़े सपने देखे और उन्हें साकार करने के लिए आधुनिक अवसर पाए, यही हमारी प्रतिबद्धता है। माननीय प्रधानमंत्री श्री @narendramodi जी के विकसित भारत के विज़न के अनुरूप, दिल्ली के सरकारी विद्यालयों में विश्वस्तरीय शिक्षण सुविधाओं का विस्तार निरंतर किया जा रहा है।… pic.twitter.com/nlE02blWF0 सर्वोदय विद्यालय, पीतमपुरा में स्थापित यह अत्याधुनिक STEM Innovation Lab भारत के प्रख्यात क्रिकेटर और Da One Group के चेयरमैन शिखर धवन की पहल बनाई गई. यह शिखर धवन फाउंडेशन की संचालिका सोफी धवन और HMD Global के CEO एवं South Asia Head रवि कुंवर और HMD Global के सहयोग से स्थापित की गई है.
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Dainik Jagran
Aug 6, 2026, 02:41 PM
भारत ने अग्नि-4 मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण किया

भारत ने अग्नि-4 मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण किया

भारत ने अपनी सैन्य ताकत में एक और ऐतिहासिक अध्याय जोड़ते हुए मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल 'अग्नि-4' का सफल परीक्षण किया है। यह परीक्षण ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज से 'स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड' की देखरेख में किया गया। रक्षा सूत्रों के मुताबिक, मिसाइल ने अपने सभी तकनीकी और ऑपरेशनल पैमानों पर शत-प्रतिशत खरा उतरकर सफलता का परचम लहराया है। बता दें कि अग्नि-4 को बेहद आधुनिक तकनीक से लैस किया गया है। इसमें पांचवीं पीढ़ी का ऑनबोर्ड कंप्यूटर और उन्नत एवियोनिक्स दिए गए हैं। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि उड़ान के दौरान यदि रास्ते में कोई बाधा आती है, तो यह मिसाइल खुद-ब-खुद उसे पहचानकर अपना रास्ता ठीक करने में सक्षम है। यही वजह है कि इसे भारत की सबसे भरोसेमंद रणनीतिक मिसाइलों में गिना जाता है। इसके अलावा इस मिसाइल में खास नेविगेशन सिस्टम (RINS और MINGS) का इस्तेमाल किया गया है। इनकी बदौलत अग्नि-4 बिना किसी चूक के सीधे अपने लक्ष्य पर सटीक प्रहार करती है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी यह सटीकता भारत की रक्षा और सामरिक ताकत को कई गुना बढ़ा देती है। इन सभी ताकतों के अलावा, इस मिसाइल में एक और खास बात है, जिसके बदौलत ये मिसाइल आज के दौर में भारत के दुश्मनों की नींद उड़ाने में सक्षम है। इस बात को ऐसे मसझिए कि दुश्मन के इलाके में घुसने पर जब मिसाइल वापस लौटती है, तो भयंकर गर्मी पैदा होती है। अग्नि-4 में लगी 'री-एंट्री हीट शील्ड' ने कमाल दिखाते हुए करीब 4000 डिग्री सेल्सियस तक के भारी तापमान को आसानी से झेल लिया। हैरानी की बात यह रही कि बाहरी सतह पर इतनी भीषण आग होने के बावजूद, मिसाइल के अंदर रखे संवेदनशील उपकरण बिल्कुल सुरक्षित रहे और भीतर का तापमान 50 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे बना रहा। गौरतलब है कि भारत के पास पहले से ही अग्नि-1, अग्नि-2, अग्नि-3 और पृथ्वी जैसी मिसाइलें मौजूद हैं। अब 'अग्नि-4' के इस सफल परीक्षण से देश की 3000 किलोमीटर से अधिक दूरी तक मार करने की क्षमता और मजबूत हो गई है, जिससे भारत की रक्षा प्रणाली और अधिक अजय बन गई है।
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Dainik Jagran
Aug 6, 2026, 01:46 PM
आपके हाथों में बीमाः कैसे प्रौद्योगिकी जीवन बीमा में क्रांति ला रही है

आपके हाथों में बीमाः कैसे प्रौद्योगिकी जीवन बीमा में क्रांति ला रही है

भारी कागजी कार्रवाई, एजेंटों के चक्कर और क्लेम अटकने का डर अब गुजरे जमाने की बात हो चुके हैं। तकनीक और स्मार्टफोन ने अब बीमा को सीधे आपके हाथ में दे दिया है, जिससे आपका समय, पैसा और मानसिक तनाव बच रहा है। जानिए कैसे यह डिजिटल बदलाव सीधे आम ग्राहक को फायदा पहुंचा रहा है और '2047 तक सबके लिए बीमा' की राह आसान कर रहा है, अत्रि चक्रवर्ती के नजरिए से... पारंपरिक रूप से जटिल माने जाने वाले जीवन बीमा उत्पाद आज तकनीक के चलते बेहद सरल हो चुके हैं। इस डिजिटल बदलाव का सबसे बड़ा फायदा सीधे आपको यानी आम बीमा खरीदार को मिल रहा है। पारदर्शिता इतनी बढ़ गई है कि अब कंपनियों या एजेंटों के दावों पर आंख मूंदकर भरोसा करने की जरूरत नहीं है। अब देश के आम से आम नागरिक तक वित्तीय सुरक्षा की पहुंच बहुत आसान और सुरक्षित हो गई है। अब आपको बीमा पालिसी लेने के लिए एजेंटों से लंबी मुलाकातें करने या फोन काल्स पर समय बर्बाद करने की कोई जरूरत नहीं है। तकनीक ने इस पूरी उलझन को आपके स्मार्टफोन ऐप के भीतर समेट दिया है। आसान यूजर इंटरफेस की मदद से आप घर बैठे चंद मिनटों में कोटेशन प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं। कंपनियों की प्रोसेसिंग और अंडरराइटिंग अब रियल टाइम में होती है, जिससे आपको काउंटर पर ही तुरंत जीवन बीमा पालिसी मिल जाती है। पैसा और भविष्य के लिए पर्सनल ज्योतिषीय मार्गदर्शन — और जानें तकनीक जिस रफ्तार से उत्पादों और प्रक्रियाओं को बदल रही है, उससे साल 2047 तक ‘सबके लिए बीमा’ का राष्ट्रीय लक्ष्य आपके जीवन में बहुत जल्द हकीकत बनने जा रहा है। डिजिटल प्रक्रियाओं ने बीमा कंपनियों से आपके जुड़ने के तरीके को पूरी तरह सहूलियत भरा बना दिया है। डिजिटल आनबोर्डिंग, सेल्फ-सर्विस पोर्टल और मोबाइल ऐप्स के जरिए आप खुद आसानी से अलग-अलग बीमा उत्पादों की तुलना कर सकते हैं और बिना किसी दबाव के सही फैसला ले सकते हैं। इंटरएक्टिव कैलकुलेटर ने भारी-भरकम कागजी कार्रवाई और किसी बाहरी व्यक्तिगत सलाह की निर्भरता को पूरी तरह खत्म कर दिया है।अगर आप दूर-दराज के इलाकों में रहते हैं या तकनीक-पसंद युवा हैं, तो ई-केवाईसी, डेटा ब्यूरो और अकाउंट एग्रीगेटर आधारित वित्तीय सत्यापन आपके लिए ही बने हैं। अक्सर लोग इस भ्रम में गलत पालिसी खरीद लेते हैं क्योंकि उन्हें अपनी जरूरत का पता नहीं होता। लेकिन अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एडवांस्ड एनालिटिक्स के जरिए कंपनियां आपकी पसंद और वित्तीय व्यवहार को समझकर आपको केवल वही सुझाव देती हैं जो आपके काम के हों। अब आपको अपनी जेब पर भारी बोझ डालने की जरूरत नहीं है। कंपनियां आजकल आपकी व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुसार कवरेज बढ़ाने के लिए बजट-अनुकूल एड-आन राइडर की सुविधा दे रही हैं। इसके अलावा बाजार में आ चुके सैशे प्रोडक्ट्स बेहद कम प्रीमियम में आपकी विशिष्ट जरूरतों के लिए कवरेज उपलब्ध कराते हैं। इस हाइपर-पर्सनलाइजेशन का अगला चरण आपके लिए और भी फायदेमंद होने वाला है। बीमा कंपनियां अब आईओटी डिवाइस के जरिए आपके रियल टाइम डेटा का उपयोग कर डायनामिक प्राइसिंग पर काम कर रही हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि आपका प्रीमियम आपकी जीवनशैली और वास्तविक सुरक्षा जरूरतों के हिसाब से तय होगा, जो उत्पाद डिजाइन में एक बड़ा और किफायती नवाचार है। ग्राहक सेवा के नाम पर अब आपको घंटों इंतजार करने की जरूरत नहीं है। एआई आधारित चैटबाट, वायस असिस्टेंट और आपकी अपनी क्षेत्रीय भाषाओं में पर्सनलाइज्ड वीडियो ने आपकी मदद को बेहद आसान बना दिया है। ये वर्चुअल असिस्टेंट 24/7 आपकी सेवा में उपलब्ध रहते हैं। ये न सिर्फ आपके सवालों के तुरंत जवाब देते हैं, बल्कि पालिसी के जटिल तकनीकी शब्दों को आपकी आसान भाषा में समझाते हैं ताकि आपको लंबे दस्तावेज न पढ़ने पड़ें। अपनी पालिसी को चालू रखना अब पहले से कहीं ज्यादा आसान है। डिजिटल पेमेंट विकल्पों की मदद से आप घर बैठे कुछ ही क्लिक में आटोमेटेड पेमेंट सेट कर सकते हैं, जिससे आपकी पालिसी का नवीनीकरण समय पर और बिना किसी झंझट के हो जाता है। जिस क्लेम प्रक्रिया को लोग पारंपरिक रूप से सबसे कठिन और थकाऊ मानते थे, तकनीक ने उसे आपके लिए पारदर्शी बना दिया है। अब आप डिजिटल तरीके से घर बैठे अपना क्लेम जमा कर सकते हैं और उसकी स्थिति को रियल टाइम में ट्रैक कर सकते हैं। आपको हर चरण का अपडेट मिलता रहता है। वीडियो/इमेज आधारित आकलन और ओसीआर दस्तावेजीकरण के कारण क्लेम निपटान का समय बहुत घट गया है, जिससे आपको तेजी से पैसा मिलता है। दरअसल डिजिटल माध्यमों के जरिए बीमा कंपनियां आपके वित्तीय भविष्य और सुरक्षा से जुड़ने के तरीके को एक नया और सुरक्षित रूप दे रही हैं। जैसे-जैसे ये नवाचार आगे बढ़ेंगे, आपको और अधिक सरल, प्रासंगिक और समावेशी समाधान मिलेंगे। इससे कंपनियों पर भरोसा मजबूत होगा और एक ग्राहक के रूप में आपके साथ उनका जीवनभर का एक सुरक्षित संबंध बनेगा।
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Aaj Tak
Aug 6, 2026, 12:08 PM
भारत का तुर दाल जीनोम मानचित्रणः खाद्य सुरक्षा के लिए एक सफलता

भारत का तुर दाल जीनोम मानचित्रणः खाद्य सुरक्षा के लिए एक सफलता

भारत में शायद ही कोई घर होगा, जहां अरहर की दाल नहीं बनती हो. अब यही दाल एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि की वजह बनी है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के वैज्ञानिकों ने पहली बार अरहर दाल का पूरा जीनोम तैयार कर लिया है. आसान भाषा में कहें तो उन्होंने अरहर का पूरा जेनेटिक नक्शा पढ़ लिया है. यह काम अप्रैल 2026 में पूरा हुआ. वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे आने वाले समय में ज्यादा पैदावार देने वाली, बीमारियों से बचने वाली और बदलते मौसम को झेलने वाली नई किस्में तैयार करना आसान होगा. अरहर भारत की सबसे जरूरी दलहनी फसलों में से एक है. देश में करोड़ों लोग प्रोटीन के लिए इस दाल पर निर्भर हैं. लेकिन इसकी पैदावार कई सालों से ज्यादा नहीं बढ़ी है. यही वजह है कि भारत को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए हर साल दूसरे देशों से भी अरहर मंगानी पड़ती है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह नई खोज इस समस्या को कम करने में मदद कर सकती है. जीनोम को आसान भाषा में समझें तो यह किसी भी पौधे का पूरा ब्लूप्रिंट या पूरी जानकारी की किताब होती है. इससे पता चलता है कि पौधा कैसे बढ़ेगा, उसकी पैदावार कितनी होगी और वह बीमारियों या खराब मौसम का सामना कैसे करेगा. अरहर के जीनोम में करीब 75 करोड़ DNA अक्षर और 11 क्रोमोसोम हैं. अब वैज्ञानिकों ने इसे बिना कोई हिस्सा छोड़े पूरा पढ़ लिया है. भारत ने 2011 में भी अरहर का जीनोम तैयार किया था, लेकिन वह पूरा नहीं था. इस बार वैज्ञानिकों ने जीनोम का कोई हिस्सा नहीं छोड़ा. उन्होंने सभी 11 क्रोमोसोम, 22 टेलोमियर और 36,557 जीन की पहचान कर ली है. इससे अब यह समझना आसान होगा कि कौन-सा जीन किस काम के लिए जिम्मेदार है. इस जानकारी की मदद से वैज्ञानिक जल्दी पता लगा सकेंगे कि कौन-सा जीन ज्यादा पैदावार देता है, कौन-सा बीमारी से बचाता है और कौन-सा सूखे जैसे हालात में भी फसल को बचा सकता है. इससे नई किस्में पहले के मुकाबले जल्दी तैयार की जा सकेंगी. ऐसी अरहर भी विकसित की जा सकती है जो जल्दी पक जाए और मशीन से आसानी से कट सके. इसका असर अभी तुरंत नहीं दिखेगा. नई किस्में तैयार होने और किसानों तक पहुंचने में अभी कुछ साल लगेंगे. लेकिन अगर पैदावार बढ़ती है तो भविष्य में दाल की कमी कम हो सकती है और आयात पर निर्भरता भी घट सकती है. भारत हर साल करीब 40 लाख टन अरहर पैदा करता है, लेकिन मांग पूरी करने के लिए आयात भी करना पड़ता है. सरकार 2030-31 तक दलहन उत्पादन को करीब 3.5 करोड़ टन तक पहुंचाना चाहती है. यह खोज उस दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है. यह खोज आज आपकी थाली में दाल नहीं बदलेगी, लेकिन आने वाले समय में बेहतर, ज्यादा पैदावार देने वाली और मजबूत अरहर की किस्में बनाने में बड़ी मदद करेगी. इसका फायदा किसानों के साथ-साथ आम लोगों को भी मिल सकता है.
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Aaj Tak
Aug 6, 2026, 11:47 AM
गूगल के चार शीर्ष इंजीनियरों ने नया ए. आई. स्टार्टअप शुरू करने के लिए छोड़ा, शेयरों में गिरावट

गूगल के चार शीर्ष इंजीनियरों ने नया ए. आई. स्टार्टअप शुरू करने के लिए छोड़ा, शेयरों में गिरावट

गूगल को बड़ा झटका लगा है. कंपनी के सबसे अनुभवी इंजीनियरों और AI वैज्ञानिकों में शामिल चार जेफ डीन, संजय घेमावत, ओरियोल विनाल्स और क्वॉक ली ने कंपनी छोड़ने का फैसला किया है. चारों अब मिलकर Discovery Loop नाम का नया AI स्टार्टअप शुरू कर रहे हैं. इस खबर के सामने आते ही गूगल की पेरेंट कंपनी Alphabet के शेयरों में करीब 4% की गिरावट दर्ज की गई. इन्वेस्टर्स को चिंता है कि गूगल की AI टीम से लगातार बड़े नाम बाहर जा रहे हैं. जेफ डीन का जाना सबसे बड़ी खबर मानी जा रही है. इसकी वजह यह है कि वह गूगल के 30वें कर्मचारी थे. उन्होंने 1999 में कंपनी जॉइन की थी और करीब 27 साल तक गूगल में काम किया. Google Search को बड़े स्तर पर चलाने वाली कई अहम तकनीकों को बनाने में उनका बड़ा योगदान रहा. बाद में उन्होंने Google Brain की शुरुआत की और AI रिसर्च को आगे बढ़ाया. हार्डवेयर टेंसर प्रोसेसिंग यूनिट (TPU) प्रोजेक्ट शुरू करने में भी उनकी अहम भूमिका रही. यही TPU आज Gemini समेत गूगल के बड़े AI मॉडल को ट्रेन और चलाने में इस्तेमाल होते हैं. जेफ डीन सिर्फ एक इंजीनियर नहीं थे. उन्हें गूगल के सबसे प्रभावशाली टेक लीडर्स में गिना जाता है. कंपनी के अंदर उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जाता था जो किसी मुश्किल तकनीकी समस्या का हल निकाल सकते थे. सर्च, क्लाउड, मशीन लर्निंग और जेमिनाई जैसे कई बड़े प्रोजेक्ट में उनकी भूमिका रही. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में उनका नाम उन लोगों में लिया जाता है जिन्होंने गूगल को रिसर्च से लेकर प्रोडक्ट तक पहुंचाने में मदद की. Announcing Discovery Loop! I am very excited to announce that, along with my longtime friends and collaborators @Sanjay_Ghemawat , @OriolVinyalsML and @quocleix , we are founding Discovery Loop ( @DiscoLoopAI ), a Public Benefit Corporation whose mission is to automate machine… pic.twitter.com/ancoplyNvN जेफ डीन के साथ कंपनी छोड़ रहे संजय घेमावत भी गूगल के शुरुआती कर्मचारियों में रहे हैं. गूगल सर्च को दुनिया भर में तेज और भरोसेमंद बनाने वाली तकनीकों जैसे गूगल फाइल सिस्टम, मैप रेड्यूस और बिग टेबल के डेवेलपमेंट में उनका बड़ा योगदान रहा. आज दुनिया की कई Cloud और AI तकनीकें इन्हीं सिस्टम से प्रेरित मानी जाती हैं. वहीं ओरियोल विनाल्स और क्वॉक ली पिछले कई साल से गूगल के AI रिसर्च का अहम हिस्सा रहे हैं. ओरियोल ने लार्ज लैंग्वेज भाषा मॉडल (LLM) और जेमेनाई से जुड़े रिसर्च में काम किया, जबकि ली डीप लर्निंग और बड़े AI मॉडल डेवेलप करने वाले प्रमुख साइनटिस्ट्स में गिने जाते हैं. AI रिसर्च की दुनिया में दोनों के कई रिसर्च पेपर्स काफी पॉपुलर रहे हैं. चारों मिलकर अब डिस्कवरी लूप नाम की नई कंपनी बना रहे हैं. यह सिर्फ एक और ChatGPT जैसा चैटबॉट बनाने वाली कंपनी नहीं होगी. इसका मकसद AI की मदद से वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग रिसर्च को फास्ट करना है. कंपनी ऐसे AI सिस्टम तैयार करना चाहती है जो कई स्टेप वाले रिसर्च और इंजीनियरिंग के काम को काफी हद तक अपने आप पूरा कर सकें. यानी नई दवाएं खोजने, नई सामग्री विकसित करने, हार्डवेयर डिजाइन करने और दूसरे वैज्ञानिक कामों में AI की मदद ली जा सके. कंपनी को पब्लिक बेनेफिट कॉर्पोरेशन के रूप में बनाया जा रहा है. दिलचस्प ये है कि गूगल भी इसमें इन्वेस्टर के तौर पर हिस्सेदारी रखेगा. यह बदलाव ऐसे समय पर हुआ है जब गूगल पहले से AI टैलेंट को बचाए रखने की चुनौती का सामना कर रहा है. पिछले कुछ महीनों में नोआम शजीर, जॉन जंपर और दूसरे कई बड़े AI रिसर्चर्स भी गूगल छोड़ चुके हैं या दूसरी कंपनियों में चले गए हैं. OpenAI, Anthropic और Meta जैसी कंपनियां AI एक्सपर्ट्स को अट्रैक्ट करने के लिए बड़ी सैलरी और इक्विटी ऑफर कर रही हैं. इसी वजह से AI सेक्टर में टैलेंट की लड़ाई पहले से ज्यादा तेज हो गई है. गूगल ने इस बदलाव के साथ अपनी AI लीडरशिप में भी फेरबदल किया है. गूगल के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विंग डीपमाइंड के CEO डेमिस हसाबिस अब पेरेंट कंपनी ऐल्फाबेट के चीफ साइंटिस्ट और डीपमाइंट के चेयरमैन की भूमिका निभाएंगे. वहीं Google Deepmind के CTO कोरे कावुकोगलू अब रोजमर्रा के AI ऑपरेशन संभालेंगे और जेमेनाोई जैसे बड़े AI प्रोजेक्ट्स की जिम्मेदारी भी उनके पास होगी. कंपनी का कहना है कि इस बदलाव का मकसद AI रिसर्च और प्रोडक्ट डेवलपमेंट को और तेज करना है.
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Aaj Tak
Aug 6, 2026, 11:43 AM
बिहार के स्वास्थ्य विभाग ने स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सॉफ्टवेयर विकसित किया

बिहार के स्वास्थ्य विभाग ने स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सॉफ्टवेयर विकसित किया

बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं को तकनीक के जरिए और बेहतर बनाने की तैयारी चल रही है. स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार ने बताया कि विभाग ऐसा AI आधारित सॉफ्टवेयर विकसित कर रहा है, जिससे राज्य के अलग-अलग अस्पतालों में उपलब्ध बेड और डॉक्टरों की जानकारी आसानी से मिल सकेगी. इसका मकसद मरीजों को समय पर सही अस्पताल तक पहुंचाना और इलाज में होने वाली देरी को कम करना है. नए सिस्टम के जरिए ICU, वार्ड और सामान्य बेड की उपलब्धता का पता लगाया जा सकेगा. मसलन, अगर किसी जिला अस्पताल से मरीज को मेडिकल कॉलेज या बड़े अस्पताल के लिए रेफर किया जाता है, तो डॉक्टर पहले यह देख सकेंगे कि वहां बेड खाली है या नहीं. अगर किसी एक संस्थान में जगह नहीं है तो दूसरे अस्पताल का विकल्प भी सामने होगा. स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि विभाग अलग-अलग जरूरतों के लिए कई सॉफ्टवेयर तैयार कर रहा है. AI के माध्यम से स्वास्थ्य संस्थानों में उपलब्ध संसाधनों की जानकारी जुटाने और उसकी निगरानी करने की व्यवस्था बनाई जा रही है. इससे मरीजों को रेफरल के दौरान इधर-उधर भटकने की समस्या से राहत मिलने की उम्मीद है. निशांत कुमार के मुताबिक, अगर किसी सदर अस्पताल में इलाज के लिए आए मरीज को आगे मेडिकल कॉलेज अस्पताल भेजना है, तो डॉक्टर AI सिस्टम के जरिए वहां बेड की स्थिति जान सकेंगे. अगर संबंधित मेडिकल कॉलेज में बेड उपलब्ध नहीं है, तो सिस्टम के जरिए दूसरे अस्पताल में जगह की जानकारी हासिल की जा सकेगी. इस व्यवस्था से गंभीर मरीजों को रेफर करने की प्रक्रिया ज्यादा व्यवस्थित होने की उम्मीद है. खासतौर पर ICU बेड की जरूरत वाले मरीजों के मामले में पहले से उपलब्धता पता होने पर समय बचाया जा सकता है. स्वास्थ्य विभाग का लक्ष्य ऐसी तकनीक विकसित करना है, जिससे इलाज के लिए सही जगह चुनने में डॉक्टरों को तत्काल जानकारी मिल सके. मंत्री ने यह भी बताया कि राज्य के स्वास्थ्य संस्थानों में एक फोन और लैंडलाइन आधारित व्यवस्था भी लगाने की तैयारी है. इसमें वीडियो की सुविधा उपलब्ध कराने की योजना है. इसका इस्तेमाल स्वास्थ्य संस्थानों के बीच संपर्क और जानकारी साझा करने के लिए किया जा सकेगा. स्वास्थ्य मंत्री के अनुसार, बिहार में करीब 14 हजार स्वास्थ्य संस्थान हैं. इनमें हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर से लेकर मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल तक शामिल हैं. विभाग AI आधारित सॉफ्टवेयर के जरिए इन संस्थानों में उपलब्ध सुविधाओं और संसाधनों की जानकारी जुटाने की दिशा में काम कर रहा है. सिस्टम के जरिए डॉक्टरों की उपलब्धता की जानकारी भी हासिल की जा सकेगी. यानी स्वास्थ्य विभाग को यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि किसी संस्थान में डॉक्टर उपलब्ध हैं या नहीं और मरीजों को किस जगह बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मिल सकती है. बेड की स्थिति भी इसी डिजिटल व्यवस्था के जरिए ट्रैक करने की कोशिश होगी. सरकार का मानना है कि AI आधारित यह व्यवस्था स्वास्थ्य सेवाओं की मॉनिटरिंग को मजबूत कर सकती है. बेड, डॉक्टर और अन्य सुविधाओं की जानकारी समय पर मिलने से रेफरल सिस्टम ज्यादा प्रभावी होगा और मरीजों को बेहतर इलाज उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी. विभाग फिलहाल इस तरह के सॉफ्टवेयर विकसित करने की प्रक्रिया में जुटा है.
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Aug 6, 2026, 10:35 AM
भारत में भारी बारिश की घटनाओं में वृद्धिः अध्ययन ने बाढ़ और सूखे के जोखिमों की चेतावनी दी

भारत में भारी बारिश की घटनाओं में वृद्धिः अध्ययन ने बाढ़ और सूखे के जोखिमों की चेतावनी दी

केरल में बारिश का तरीका बदल रहा है. 124 साल के बारिश के आंकड़ों पर हुई एक नई स्टडी में यह बात सामने आई है. स्टडी के मुताबिक राज्य में 24 घंटे के अंदर 20.4 सेंटीमीटर या उससे ज्यादा बारिश होने के मामले बढ़ रहे हैं. यह बदलाव सबसे ज्यादा उत्तरी केरल और पश्चिमी घाट के इलाकों में देखा गया है. यह स्टडी मौसम विभाग (IMD), अमृता विश्व विद्यापीठम, एनआईटी पटना और भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (IIST) के वैज्ञानिकों ने मिलकर की है. उनका कहना है कि अगर यही ट्रेंड आगे भी जारी रहा तो बाढ़ और सूखे का खतरा बढ़ सकता है. वैज्ञानिकों ने 124 साल के बारिश के रिकॉर्ड को देखा. इसमें पता चला कि अब बारिश पहले की तरह पूरे मौसम में बराबर नहीं हो रही. अब कम समय में बहुत ज्यादा बारिश हो रही है. इससे एक तरफ बाढ़ का खतरा बढ़ता है, तो दूसरी तरफ लंबे समय तक बारिश नहीं होने पर पानी की कमी भी हो सकती है. इस स्टडी में प्रीसिरिटेशन कॉन्सनट्रेशन इंडेक्स (PCI) का इस्तेमाल किया गया. यह एक पैमाना है, जिससे पता चलता है कि बारिश पूरे साल बराबर हुई या कुछ दिनों और कुछ जगहों पर ही ज्यादा हुई. स्टडी में पाया गया कि केरल में PCI लगातार बढ़ रहा है। इसका मतलब है कि बारिश अब पहले के मुकाबले ज्यादा असमान हो रही है। यानी कुछ जगहों पर बहुत ज्यादा बारिश हो रही है, जबकि कई इलाकों में कम बारिश हो रही है। इससे मौसम से जुड़ी परेशानियां बढ़ सकती हैं. स्टडी के मुताबिक उत्तरी केरल और पश्चिमी घाट के इलाकों में सबसे ज्यादा बदलाव देखा गया है. यहां कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होने के मामले बढ़े हैं. इससे नदियां जल्दी भर सकती हैं, बाढ़ आ सकती है और लैंडस्लाइड का खतरा भी बढ़ सकता है. अगर बारिश कुछ ही दिनों में बहुत ज्यादा हो और बाकी समय कम हो, तो खेती और पानी की सप्लाई पर भी असर पड़ सकता है. इससे लोगों को पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता है. पिछले कुछ सालों में केरल में कई बार भारी बारिश, बाढ़ और लैंडस्लाइड की घटनाएं हुई हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि मौसम में हो रहे बदलाव ऐसे मामलों को और बढ़ा सकते हैं. इसलिए लंबे समय के बारिश के आंकड़ों का अध्ययन करना जरूरी है. इस स्टडी से साफ है कि केरल में सिर्फ बारिश की मात्रा ही नहीं, बल्कि उसका पैटर्न भी बदल रहा है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस जानकारी का इस्तेमाल पहले से तैयारी करने, बाढ़ से बचाव और पानी के बेहतर इस्तेमाल की योजना बनाने में किया जा सकता है.
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Aug 6, 2026, 10:08 AM
दिल्ली के मुख्यमंत्री ने भविष्य के लिए तैयार कौशल को बढ़ावा देने के लिए एसटीईएम नवाचार प्रयोगशाला का उद्घाटन किया

दिल्ली के मुख्यमंत्री ने भविष्य के लिए तैयार कौशल को बढ़ावा देने के लिए एसटीईएम नवाचार प्रयोगशाला का उद्घाटन किया

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने गुरुवार को पीतमपुरा स्थित सर्वोदय विद्यालय में स्थापित साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग एंड मैथमेटिक्स (STEM) इनोवेशन लैब का उद्घाटन किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने कहा कि आज के दौर में साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथमेटिक्स केवल विषय नहीं, बल्कि भविष्य की अर्थव्यवस्था और राष्ट्र निर्माण की आधारशिला हैं। ऐसे में विद्यार्थियों को केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित रखने के बजाय उन्हें प्रयोग आधारित शिक्षा, रचनात्मक सोच और समस्या-समाधान की क्षमता से सशक्त बनाना समय की आवश्यकता है।
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Aug 6, 2026, 08:24 AM
सौर दूरबीन ने आश्चर्यजनक छवियों के साथ सूर्य की सतह के रहस्यों का खुलासा किया

सौर दूरबीन ने आश्चर्यजनक छवियों के साथ सूर्य की सतह के रहस्यों का खुलासा किया

दुनिया के सबसे ताकतवर सोलर टेलीस्कोप डैनियल के. इनोये सोलर टेलीस्कोप ने सूरज की सतह की अब तक की सबसे साफ तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्ड किए हैं. यह शोध 5 अगस्त को जर्नल नेचर में छपा. वैज्ञानिकों ने हवाई के माउई द्वीप पर मौजूद इस टेलीस्कोप से सूरज के एक सनस्पॉट के पास का हिस्सा बहुत करीब से देखा. इस दौरान उन्हें सूरज की सतह पर छोटे-छोटे घूमते हुए चुंबकीय भंवर दिखाई दिए. वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे सौर तूफान कैसे बनते हैं और सूरज की बाहरी परत कोरोना इतनी ज्यादा गर्म क्यों रहती है, इसे समझने में बड़ी मदद मिल सकती है. सूरज हमें दूर से शांत दिखता है, लेकिन उसकी सतह पर हर समय हलचल होती रहती है. वहां गर्म प्लाज्मा लगातार इधर-उधर बहता रहता है और चुंबकीय क्षेत्र भी बदलते रहते हैं. नई तस्वीरों और कंप्यूटर सिमुलेशन की मदद से वैज्ञानिक पहली बार इन छोटे-छोटे भंवरों को साफ देख पाए हैं. उनका मानना है कि यही भंवर सूरज में चुंबकीय एनर्जी बनने और फैलने में अहम भूमिका निभाते हैं. वैज्ञानिकों ने जिस प्रक्रिया को देखा है, उसे केल्विन-हेल्महोल्ट्ज़ अस्थिरता (Kelvin-Helmholtz Instability या KHI) कहा जाता है. यह तब बनती है, जब प्लाज्मा या गैस की दो धाराएं अलग-अलग रफ्तार से एक-दूसरे के पास से गुजरती हैं. इससे छोटे-छोटे घूमते हुए भंवर बनते हैं. ऐसी प्रक्रिया पहले बादलों, समुद्र की लहरों और जूपिटर जैसे ग्रहों के वातावरण में देखी जा चुकी है. लेकिन सूरज पर इसे पहली बार इतनी साफ तस्वीरों में देखा गया है. शोध के प्रमुख लेखक और नेशनल सोलर ऑब्जर्वेटरी के वैज्ञानिक डॉ. डेविड कुरिड्जे के मुताबिक, ये छोटे भंवर सूरज के चुंबकीय क्षेत्रों को मोड़ते और उलझाते हैं. इससे मेग्नेटिक एनर्जी जमा होती रहती है. बाद में यही एनर्जी अचानक बाहर निकलती है और सोलर फ्लेयर और कोरोनल मास इजेक्शन (CME) जैसी घटनाएं होती हैं. अगर ये पृथ्वी की तरफ आते हैं, तो सैटेलाइट, जीपीएस, रेडियो नेटवर्क और बिजली ग्रिड पर असर पड़ सकता है. वैज्ञानिक लंबे समय से यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि सूरज की बाहरी परत कोरोना, उसकी सतह से ज्यादा गर्म क्यों है. इस नए अध्ययन के मुताबिक, ये छोटे भंवर बड़ी प्लाज्मा धाराओं को छोटे हिस्सों में बांट देते हैं. इससे एनर्जी छोटे स्तर तक पहुंचती है और गर्मी के रूप में बाहर निकलती है. वैज्ञानिकों का मानना है कि कोरोना के ज्यादा गर्म होने की एक बड़ी वजह यही हो सकती है. यह खोज डैनियल के. इनोये सोलर टेलीस्कोप की मदद से हुई है. यह हवाई के माउई द्वीप पर स्थित है. इसके मुख्य शीशे का आकार 4 मीटर (करीब 13 फीट) है. इसमें ऐसी तकनीक लगी है, जो पृथ्वी के वातावरण की वजह से तस्वीरों में आने वाली धुंधलाहट को कम कर देती है. इसी वजह से वैज्ञानिक सूरज की बहुत छोटी-छोटी चीजें भी साफ देख पाए. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह खोज भविष्य में सौर तूफानों को बेहतर तरीके से समझने में मदद करेगी. अगर इन छोटे भंवरों और बड़े सौर विस्फोटों के बीच का संबंध पूरी तरह समझ में आ गया, तो सैटेलाइट, संचार व्यवस्था और बिजली ग्रिड को पहले से सुरक्षित रखने की तैयारी करना आसान हो सकता है.
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Aug 6, 2026, 06:19 AM
आई. आई. टी. बॉम्बे के छात्रों ने पुर्तगाल में प्रतियोगिता के लिए कार का डिजाइन और निर्माण किया

आई. आई. टी. बॉम्बे के छात्रों ने पुर्तगाल में प्रतियोगिता के लिए कार का डिजाइन और निर्माण किया

इस परियोजना पर करीब 80 छात्रों ने काम किया, जिनमें लगभग 30 फीसदी छात्राएं शामिल हैं। टीम के अधिकांश सदस्य बीटेक के छात्र हैं। प्रतियोगिता में भाग लेने से पहले कार को पूरी तरह खोलकर पुर्तगाल ले जाया गया, जहां निर्धारित समय में उसे दोबारा जोड़कर ट्रैक पर उतारा गया। कार के अधिकांश पुर्जी का डिजाइन और निर्माण आईआईटी बॉम्बे में ही किया गया।
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Aug 6, 2026, 04:35 AM
स्मार्टफोन में यूनिवर्सल फ्लैश स्टोरेज (यू. एफ. एस.) तकनीक को समझना

स्मार्टफोन में यूनिवर्सल फ्लैश स्टोरेज (यू. एफ. एस.) तकनीक को समझना

आपका फोन कितनी जल्दी कोई एप खोलता है, भारी-भरकम फाइल्स कितनी तेजी से कॉपी होती हैं, या फिर हाई-ग्राफिक्स वाले गेम्स कितने मक्खन की तरह चलते हैं, यह सब फोन की स्टोरेज तकनीक पर ही निर्भर करता है। आज के समय में, हर स्मार्टफोन में UFS (यूनिवर्सल फ्लैश स्टोरेज) का इस्तेमाल होता है, जो हर नई जनरेशन के साथ और भी फास्ट और स्मार्ट हो रहा है। ऐसे में अगर आप नया स्मार्टफोन खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो इन तीनों स्टोरेज स्टैंडर्ड का अंतर समझना जरूरी है।विज्ञापनयूनिवर्सल फ्लैश स्टोरेज यानी UFS आधुनिक स्मार्टफोन में इस्तेमाल होने वाली इंटरनल स्टोरेज तकनीक है। इसे आप फोन की डेटा स्टोरेज सिस्टम भी कह सकते हैं, जो यह तय करती है कि डिवाइस कितनी तेजी से डेटा पढ़ (Read) और लिख (Write) सकता है। जितना नया और तेज UFS स्टैंडर्ड होगा, उतनी ही तेजी से एप्स खुलेंगे, फोटो और वीडियो सेव होंगे, बड़ी फाइलें कॉपी होंगी और फोन का पूरा अनुभव ज्यादा फास्ट महसूस होगा। इसके अलावा मल्टीटास्किंग, गेमिंग और हाई-रिजॉल्यूशन वीडियो रिकॉर्डिंग जैसी गतिविधियों में भी बेहतर प्रदर्शन मिलता है।विज्ञापनइसे एक हाईवे की तरह सोचें। हाईवे जितना चौड़ा होगा, गाड़ियां उतनी ही तेजी से दौड़ेंगी। समय के साथ, UFS के कई नए वर्जन आए हैं, जिन्होंने स्पीड और बैटरी की बचत दोनों में जबरदस्त सुधार किए हैं।ये सिर्फ नंबरों का खेल नहीं है। हर नया अपग्रेड आपके फोन चलाने के अनुभव को पूरी तरह बदल सकता है। आइए UFS स्टोरेज के बीच के अंतर को समझते हैं:आजकल के ज्यादातर मिड-रेंज और बजट स्मार्टफोन्स में आपको UFS 2.2 स्टैंडर्ड मिलता है।यह 1,200MB/s तक की 'रीड स्पीड' (डेटा पढ़ने की क्षमता) और 260MB/s की 'राइट स्पीड' (डेटा सेव करने की क्षमता) देता है।सोशल मीडिया चलाने, वीडियो देखने और हल्की-फुल्की गेमिंग के लिए यह बिल्कुल परफेक्ट है।इसमें 'WriteBooster' नाम का एक खास फीचर होता है, जो बड़े एप्स इंस्टॉल करने या भारी फाइल्स सेव करने की प्रक्रिया को तेज कर देता है।मिड-प्रीमियम या थोड़े महंगे फोन में UFS 3.1 स्टोरेज देखने को मिलता है।इसमें 2,100MB/s तक की रीड स्पीड और 1,200MB/s तक की राइट स्पीड मिलती है।स्पीड के अलावा, इसमें बैटरी बचाने के लिए 'DeepSleep' फीचर और फोन को हमेशा स्मूथ रखने के लिए 'Host Performance Booster' मिलता है।अगर आप हैवी गेमिंग करते हैं या बड़ी-बड़ी 4K वीडियो फाइल्स ट्रांसफर करते हैं, तो आपको इसकी स्पीड का असली अहसास होगा।यह फिलहाल स्टोरेज की दुनिया की सबसे एडवांस तकनीक है। यह सिर्फ तेज नहीं है, बल्कि बहुत स्मार्ट भी है।इसकी रीड स्पीड 4,200MB/s और राइट स्पीड 2,800MB/s तक जाती है, यानी पिछले वर्जन से लगभग दोगुनी रफ्तार।इसमें बेहतर स्टोरेज मैनेजमेंट और बड़े स्पेस को संभालने की गजब की क्षमता है।यह AI आधारित फीचर्स, 4K और 8K वीडियो रिकॉर्डिंग, हैवी मल्टीटास्किंग और हाई-एंड गेमिंग वाले फ्लैगशिप स्मार्टफोन में UFS 4.1 अधिक उपयोगी साबित होता है।सच कहें तो, इसका जवाब 'हां' और 'ना' दोनों है। अगर आपका दिनभर का काम सिर्फ व्हाट्सएप, कॉलिंग, इंस्टाग्राम और यूट्यूब तक सीमित है, तो UFS 2.2 आपके लिए एक स्मूथ अनुभव देने में पूरी तरह सक्षम है।लेकिन, अगर आप एक 'पावर यूजर' हैं जो फोन पर वीडियो एडिट करता है, भारी गेम्स खेलता है या फोन के AI टूल्स का रोज इस्तेमाल करता है, तो UFS 3.1 या 4.1 आपको एक अलग ही दुनिया का अहसास कराएंगे। जैसे-जैसे ऐप्स भारी हो रहे हैं, एक फास्ट स्टोरेज आपके फोन को सालों-साल नया जैसा फील कराती है।जवाब: UFS का पूरा नाम Universal Flash Storage है। यह स्मार्टफोन की इंटरनल स्टोरेज तकनीक है, जो डेटा पढ़ने और लिखने की गति तय करती है।जवाब: UFS 3.1, UFS 2.2 की तुलना में कहीं ज्यादा तेज है। इसमें तेज Read/Write स्पीड, बेहतर पावर मैनेजमेंट और बेहतर रिस्पॉन्स मिलता है।जवाब: नहीं। यदि आपका इस्तेमाल कॉलिंग, सोशल मीडिया और वीडियो देखने तक सीमित है, तो UFS 2.2 या UFS 3.1 भी पर्याप्त है।जवाब: हैवी गेमिंग, वीडियो एडिटिंग, AI फीचर्स, 4K/8K वीडियो रिकॉर्डिंग और फ्लैगशिप अनुभव चाहने वाले यूजर्स के लिए UFS 4.1 बेहतर विकल्प है।जवाब: नहीं। स्मार्टफोन खरीदते समय प्रोसेसर, RAM, बैटरी, कैमरा, डिस्प्ले, सॉफ्टवेयर सपोर्ट और स्टोरेज, सभी पहलुओं को एक साथ देखना चाहिए।
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Aug 6, 2026, 04:06 AM
एजिंग रिसर्च में सफलताएँ लंबे और स्वस्थ जीवन की ओर ले जा सकती हैं

एजिंग रिसर्च में सफलताएँ लंबे और स्वस्थ जीवन की ओर ले जा सकती हैं

शुरुआती अध्ययनों में उम्र बढ़ने के संकेत कम करने और चूहों में अल्जाइमर जैसे रोगों के लक्षण घटाने के उत्साहजनक परिणाम भी मिले हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि बुढ़ापा केवल नियति नहीं, बल्कि ऐसी जैविक प्रक्रिया है, जिस पर भविष्य में चिकित्सकीय हस्तक्षेप संभव हो सकता है।विज्ञापनराजधानी आई इंदौर के देवी अहिल्याबाई विश्वविद्यालय की वरिष्ठ माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉ. नंदिनी फड़से ने अमर उजाला से बातचीत में बताया कि दुनिया भर में उम्र बढ़ने की गति कम करने पर तेजी से शोध हो रहे हैं। यामानाका फैक्टर्स पर आधारित आंशिक सेलुलर री-प्रोग्रामिंग और जीन थेरेपी जैसी तकनीकें अगले 10 से 20 वर्षों में ऐसी चिकित्सा का रास्ता खोल सकती हैं, जो बढ़ती उम्र के असर को कम करने के साथ अल्जाइमर, हृदय रोग और कैंसर जैसी उम्र-संबंधी बीमारियों को लंबे समय तक टालने में मददगार साबित हो।उन्होंने बताया कि इस समय 'लॉन्गेविटी एस्केप वेलोसिटी' की अवधारणा सबसे अधिक चर्चा में है। इसका अर्थ है कि यदि कोई व्यक्ति अगले 10 वर्षों तक स्वयं को स्वस्थ बनाए रख सके, तो तब तक विकसित होने वाली नई तकनीकें उसे और अधिक स्वस्थ तथा लंबा जीवन दे सकती हैं।
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Aug 5, 2026, 08:25 PM
ललितपुर का बिजली विभाग नई तकनीक के साथ रिंग मुख्य इकाई का निर्माण करेगा

ललितपुर का बिजली विभाग नई तकनीक के साथ रिंग मुख्य इकाई का निर्माण करेगा

ललितपुर। बिजली विभाग शहर की बिजली व्यवस्था सुधारने के लिए नई तकनीक के तहत रिंग मेन यूनिट बनाने की तैयारी में है। इसमें शहर के लिए निकली अलग-अलग 33 केवी की तीन हाइटेंशन लाइनों का रिंग मेन यूनिट यानि 33 केवी लाइनों का जंक्शन बनाया जाएगा, जिससे यदि एक लाइन में फाल्ट होता है, तो दूसरी लाइन से जोड़कर उस क्षेत्र की बिजली आपूर्ति तत्काल चालू कर दी जाएगी।ग्राम रोंड़ा स्थित 132 केवी पारेषण उपकेंद्र से शहर में गल्ला मंडी विद्युत सब स्टेशन, जिला न्यायालय और मेडिकल कॉलेज के लिए 33 केवी लाइन निकली है, जिसके माध्यम से बिजली आपूर्ति प्रदान की जाती है। ऐसे में यदि किसी भी 33 केवी लाइन में फाल्ट हो जाता है तो उससे जुड़े सभी फीडरों की बिजली आपूर्ति बाधित हो जाती है और कई बार बड़ा फाल्ट होने पर घंटों तक शहर, न्यायालय या मेडिकल कॉलेज की आपूर्ति बाधित होने से लोगों की परेशानियां बढ़ जाती हैं। इससे कई बार जरूरी काम भी प्रभावित हो जाते हैं। इस समस्या के समाधान के लिए बिजली विभाग ने एक प्लान तैयार किया है, जिसमें बिजली विभाग ने डायट के सामने इन तीनों 33 केवी लाइनों का एक रिंग मेन यूनिट तैयार करने का निर्णय लिया है। इसके तहत इन तीनों 33 केवी लाइनों का डायट के पास रिंग मेन यूनिट का जंक्शन बनाया जाएगा। यानि गल्ला मंडी प्रथम, जिला न्यायालय और मेडिकल कॉलेज की 33 केवी लाइनों का यहां पर एक जंक्शन तैयार किया जाएगा और इन लाइनों को यहां इस प्रकार से जोड़ा जाएगा कि अगर फाल्ट या अन्य कारणों से किसी भी एक लाइन की बिजली आपूर्ति बाधित होती है, तो ऐसी स्थिति में बिजली विभाग द्वारा दो अन्य लाइनों में से किसी भी लाइन से उस फाल्ट वाली लाइन को जोड़कर उस स्थान की बिजली आपूर्ति बहाल कर जाएगी। बिजली विभाग ने इसे वर्ष 2026-27 के बिजनेस प्लान में शामिल किया है और इसका प्रस्ताव बनाकर दक्षिणांचल वितरण निगम को भेजा है।विज्ञापन-------नए प्रस्ताव में पाली, बंगरिया की लाइन 50 किलोमीटर की जगह साढ़े तीन किलोमीटर की होगीपाली और बंगरिया सब स्टेशन को कल्यानपुरा 720 केवी पारेषण उपकेंद्र से 50 किलोमीटर लंबी एक ही 33 केवी लाइन से जोड़ा गया है। इससे यदि 33 केवी लाइन में कहीं भी फाल्ट होता है तो दोनों सब स्टेशन पाली व बंगरिया के सभी फीडरों की बिजली आपूर्ति बंद हो जाती है। ऐसे में बिजली विभाग ने इस बार 2026-27 के अतिरिक्त बिजनेस प्लान में बंगरिया में बन रहे पारेषण उपकेंद्र से ही पाली और बंगरिया 33 केवी सब स्टेशन के लिए अलग-अलग नई 33 केवी लाइनें तैयार करने का प्रस्ताव भेजा है। इससे इस 33 केवी लाइन की दूरी पचास की जगह साढ़े तीन किलोमीटर रह जाएगी और इससे 33 केवी लाइन में फाल्ट भी कम हो सकेंगे। यदि फाल्ट आता भी है तो उसे कम समय में पेट्रोलिंग कर जोड़ा जा सकेगा।विज्ञापन--------शहर में गल्ला मंडी, जिला न्यायालय और मेडिकल कॉलेज की 33 केवी लाइन के लिए डायट के पास रिंग मेन यूनिट बनाने के लिए अतिरिक्त बिजनेस प्लान में प्रस्ताव तैयार कर कार्पोरेशन को भेजा गया है। प्रस्ताव पास होने पर यहां रिंग मेन यूनिट बनाई जाएगी। इससे इन तीन लाइनों में किसी भी लाइन की बिजली बंद होने पर दो अन्य लाइनों से जोड़कर बिजली आपूर्ति सुचारू की जा सकेगी।-वीरभद्र सत्यार्थी, अधीक्षण अभियंता, विद्युत।
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Aug 5, 2026, 08:16 PM
राहुल सिंह के पिता ने बेटे की मौत की निष्पक्ष जांच की मांग की

राहुल सिंह के पिता ने बेटे की मौत की निष्पक्ष जांच की मांग की

मृतक वैज्ञानिक राहुल सिंह के पिता संजय सिंह ने बुधवार को पत्रकार वार्ता में बताया कि राहुल की मौत की जांच निष्पक्ष तरीके से होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि लखनऊ में प्राथमिकी दर्ज होने के कारण मामले की कोई जानकारी नहीं मिल पा रही है। और ना ही अधिकारियों का कोई सहयोग ही मिल पा रहा है।विज्ञापनउन्होंने बताया कि पिछले 23 जुलाई को मुख्य मंत्री से मिलकर पूरे प्रकरण में निष्पक्ष जांच की मांग गई। इसके लिए मुख्यमंत्री ने निष्पक्ष जांच का भरोसा दिया। मृतक राहुल के पिता ने बताया कि अभी तक बिसरा रिपोर्ट, मोबाइल डिटेल नहीं मिल सका है, जिससे पूरे परिवार काफी निराश है।
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Aug 5, 2026, 07:57 PM
छात्रों में वैज्ञानिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए विज्ञान बस का शुभारंभ किया गया

छात्रों में वैज्ञानिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए विज्ञान बस का शुभारंभ किया गया

जिला विज्ञान क्लब के समन्वयक विवेक जौहरी ने बताया कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद की ओर से विज्ञान बस में सीबीएसई, आईसीएसई, आईएससी और यूपी बोर्ड के कक्षा 12 तक के पाठ्यक्रम पर आधारित लगभग 300 लघु फिल्में उपलब्ध हैं। इसके अलावा भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, गणित और खगोल विज्ञान से जुड़े हैंड्स-ऑन प्रयोग भी कराए जाएंगे।विज्ञापनबस में थ्रीडी प्रिंटर, ऑप्टिकल बेंच, माइक्रोस्कोप, टेलीस्कोप और 75 इंच की एलईडी स्क्रीन जैसी आधुनिक सुविधाएं मौजूद हैं। विद्यार्थी थ्री डी प्रिंटिंग की कार्यप्रणाली समझने के साथ सूक्ष्म संरचनाओं का अवलोकन कर सकेंगे। वहीं टेलीस्कोप से रात्रि में आकाश का भी दर्शन कर पाएंगे। बस में तीन वैज्ञानिक और दो तकनीकी कर्मचारी मौजूद रहेंगे।
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Aug 5, 2026, 07:24 PM
लापता बी. टेक छात्र नहर में लावारिस कार में मिला

लापता बी. टेक छात्र नहर में लावारिस कार में मिला

- देहात कोतवाली क्षेत्र में चिलकाना रोड पर हलालपुर के पास नहर में मिली कारसंवाद न्यूज एजेंसीसहारनपुर। देहात कोतवाली क्षेत्र का रहने वाला बीटेक छात्र अभिनव सैनी लापता हो गया। बुधवार सुबह चिलकाना रोड पर हलालपुर गांव के पास बड़ी नहर में उसकी कार मिली है। कार को अग्निशमन विभाग व पुलिस ने कड़ी मशक्कत कर नहर से निकाला। जांच में आया कि बीटेक में फेल होने के बाद छात्र घर से कार लेकर निकला था। पुलिस उसकी तलाश में जुटी हुई है।देहात कोतवाली क्षेत्र में आर्यनगर निवासी जितेंद्र सैनी पवन एक निजी कंपनी में नोएडा में तैनात हैं। उनका बेटा अभिनव सैनी (21) देहरादून के एक कॉलेज में बीटेक तृतीय वर्ष का छात्र है। पुलिस की प्रारंभिक जांच में सामने आया कि अभिनव का हाल ही में बीटेक रिजल्ट आया था। इसमें वह फेल हो गया था। पता लगने पर अभिभावक कॉलेज पहुंचे। इसके बाद मंगलवार रात परिजनों की डांट से नाराज होकर अभिनव कार लेकर निकल गया। काफी तलाश के बाद भी उसका पता नहीं चलने पर परिजन चिंतित थे।विज्ञापनसरसावा निवासी अभिनव के फूफा अरुण कुमार ने बताया कि काफी तलाशने के बाद पुलिस को सूचना दी गई थी। बुधवार सुबह पुलिस कंट्रोल रूम को हलालपुर गांव के पास बड़ी नहर में कार गिरी होने की सूचना मिली। इसके बाद पुलिस और दमकल विभाग टीम मौके पर पहुंची, जिसके बाद कार को बाहर निकाला गया। कार अभिनव की थी, लेकिन उसमें अभिनव नहीं था। पुलिस ने छात्र की तलाश शुरू की। गोताखोरों और अन्य संसाधनों की मदद से लगातार सर्च ऑपरेशन चलाया गया। देर शाम तक छात्र का कोई पता नहीं चल सका। अभी यह भी पता नहीं चल सका कि छात्र कहां गया। पुलिस नहर के आसपास लगे सीसीटीवी की फुटेज भी खंगाल रही है।विज्ञापन--न खिड़की खुली, न शीशे टूटे, कैसे निकला छात्रजिस समय पुलिस ने कार को बाहर निकाला न तो उसकी न खिड़की खुली थी और न ही शीशे टूटे हुए थे। ऐसे में छात्र का कार से बाहर निकलना मुश्किल है। पुलिस को आशंका है कि कहीं कार को नहर में गिराया तो नहीं गया। इस बिंदु पर भी जांच की जा रही है।--वर्जनलापता छात्र की तलाश के लिए टीमें लगी हुई हैं। पुलिस छात्र के परिजनों से भी जानकारी ले रही है। छात्र के मिलने पर ही आगे की जानकारी हो पाएगी। अभी तक परिजनों की तरफ से कोई तहरीर नहीं आई है। - मनोज कुमार यादव, सीओ द्वितीय
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Aug 5, 2026, 07:12 PM
डॉ. विनय ठाकुर को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और भू-स्थानिक सूचना विज्ञान संस्थान का महानिदेशक नियुक्त किया गया

डॉ. विनय ठाकुर को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और भू-स्थानिक सूचना विज्ञान संस्थान का महानिदेशक नियुक्त किया गया

संधोल (मंडी)। संधोल के डॉ. विनय ठाकुर को केंद्र सरकार के संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन संचालित अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी एवं भू-स्थानिक सूचना विज्ञान संस्थान का महानिदेशक (डायरेक्टर जनरल) नियुक्त किया है। इससे पूर्व एनआईसीएसआई में प्रबंध निदेशक के पद पर कार्यरत थे, जहां उनके नेतृत्व में संस्थान के कारोबार और लाभ में 60 प्रतिशत से अधिक की रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई थी। दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से कंप्यूटर इंजीनियरिंग में स्नातकोत्तर और इंजीनियरिंग में पीएचडी धारक डॉ. ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा संधोल के सरकारी स्कूल से प्राप्त की थी। उनके पिता सचिवालय में कार्यरत थे तथा माता गृहिणी हैं। उनकी पत्नी डॉ. मनीषा ठाकुर सफदरजंग अस्पताल दिल्ली में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष हैं, जबकि उनका बेटा सैन फ्रांसिस्को में मेकेनिकल इंजीनियर और बेटी ईवाई कंपनी में कार्यरत है।
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Aug 5, 2026, 03:14 PM
पुलिस कार्यशाला का उद्देश्य आधुनिक प्रौद्योगिकी के साथ अपराध-समाधान कौशल को बढ़ाना है

पुलिस कार्यशाला का उद्देश्य आधुनिक प्रौद्योगिकी के साथ अपराध-समाधान कौशल को बढ़ाना है

अपराध अनुसंधान में आधुनिक तकनीक के उपयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कबीरधाम पुलिस ने जिले के सभी थाना एवं चौकी के विवेचना अधिकारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यशाला आयोजित की। इस कार्यशाला का उद्देश्य विवेचना की गुणवत्ता में सुधार लाना और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर अपराधियों तक तेजी से पहुंच सुनिश्चित करना रहा।विज्ञापनपुलिस अधीक्षक जितेंद्र कुमार यादव के निर्देशन तथा अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक हेमसागर सिदार एवं अमित पटेल के मार्गदर्शन में एकता चौक स्थित अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक कार्यालय के सभागार में आयोजित इस प्रशिक्षण में सहायक उपनिरीक्षक, प्रधान आरक्षक और आरक्षकों ने भाग लिया।विज्ञापनकार्यशाला में फिंगरप्रिंट विशेषज्ञ एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी धर्मेंद्र कुमार भारती ने अधिकारियों को घटनास्थल से प्राप्त फिंगरप्रिंट और अन्य वैज्ञानिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने, फिंगरप्रिंट डेवलपिंग किट के सही उपयोग तथा वैज्ञानिक जांच प्रक्रिया की व्यावहारिक जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अपराध स्थल से मिले छोटे-से-छोटे साक्ष्य भी किसी जटिल मामले को सुलझाने में निर्णायक साबित हो सकते हैं।प्रशिक्षण के दौरान NAFIS (नेशनल ऑटोमेटेड फिंगरप्रिंट आइडेंटिफिकेशन सिस्टम), MCU और अन्य आधुनिक फॉरेंसिक तकनीकों के उपयोग पर भी विस्तार से जानकारी दी गई। अधिकारियों को समझाया गया कि इन प्रणालियों की मदद से अज्ञात आरोपियों की पहचान, डिजिटल रिकॉर्ड का मिलान और वैज्ञानिक तरीके से साक्ष्यों का विश्लेषण अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक हेमसागर सिदार ने कहा कि बदलते समय में वैज्ञानिक और तकनीकी साक्ष्य अपराध अनुसंधान की रीढ़ बन चुके हैं। यदि विवेचना अधिकारी इन तकनीकों का सही उपयोग करें तो अपराधों के खुलासे की सफलता दर बढ़ेगी और दोषियों के खिलाफ मजबूत साक्ष्य न्यायालय में प्रस्तुत किए जा सकेंगे।कार्यक्रम के अंत में वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी धर्मेंद्र कुमार भारती को उत्कृष्ट सहयोग के लिए स्मृति-चिह्न भेंटकर सम्मानित किया गया। प्रशिक्षण के सफल आयोजन में एमसीयू प्रभारी एएसआई चन्द्रभूषण सिंह, प्रधान आरक्षक मनीष सोनी, NAFIS प्रभारी चेतक नाथ योगी तथा आरक्षक यशवंत तिवारी की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
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Aug 5, 2026, 11:30 AM
आई. आई. पी. प्रदर्शनी में सतत सड़क निर्माण के लिए जैव-बाध्यकारी प्रौद्योगिकी का प्रदर्शन किया गया

आई. आई. पी. प्रदर्शनी में सतत सड़क निर्माण के लिए जैव-बाध्यकारी प्रौद्योगिकी का प्रदर्शन किया गया

आईआईपी ने बायो-बाइंडर प्रौद्योगिकी पर आयोजित प्रौद्योगिकी प्रदर्शनी कार्यक्रम किया, जिसमें वरिष्ठ वैज्ञानिकों, उद्योग जगत के अग्रणी प्रतिनिधियों व अनुसंधान सहयोगी शामिल हुए। आईआईपी निदेशक डॉ.हरेंद्र सिंह बिष्ट ने कहा कि बायो-बाइंडर प्रौद्योगिकी कृषि एवं बायोमास अपशिष्ट को पेट्रोलियम-आधारित बिटुमेन के पर्यावरण-अनुकूल विकल्प में परिवर्तित कर सतत सड़क निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। बायो बाइंडर तकनीक के तहत शिलांग स्थित राष्ट्रीय राजमार्ग-40 पर 100 मीटर लंबे बायो-बाइंडर परीक्षण खंड का दीर्घकालिक मूल्यांकन सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है। सफल परिणामों के आधार पर आंध्र प्रदेश सरकार ने पांच किलोमीटर लंबा बायो-बाइंडर आधारित सड़क निर्माण मूल्यांकन कार्यक्रम शुरू किया है। सीएसआईआर-सीआरआरआई सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय, एनएचएआई और भारतीय सड़क कांग्रेस के साथ मिलकर इसके तकनीकी दिशा-निर्देश तैयार कर रहा है। कार्यक्रम में सीएसआईआर-सीआरआरआई के निदेशक डॉ. सी रवि शेखर व उद्योग जगत के प्रतिनिधि मौजूद रहे।
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Aug 5, 2026, 07:26 AM
सौर पैनलों से लेकर वेंटिलेटर तकः महामारी के दौरान नोक्का रोबोटिक्स की यात्रा

सौर पैनलों से लेकर वेंटिलेटर तकः महामारी के दौरान नोक्का रोबोटिक्स की यात्रा

2020 की शुरुआत तक, नोक्का रोबोटिक्स का अस्पतालों से कोई लेना-देना नहीं था. आईआईटी कानपुर की यह स्टार्टअप कंपनी ऐसे रोबोट बनाती थी, जो बिना पानी का इस्तेमाल किए सोलर पैनलों की सफाई करते थे. यह तकनीक भारत में तेजी से बढ़ रहे सौर ऊर्जा (Renewable Energy) क्षेत्र की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित की गई थी. अस्पतालों में गंभीर मरीजों की संख्या बढ़ने से भारत में वेंटिलेटर की कमी हो गई थी. इस परेशानी को देखते हुए निखिल कुरेले और हर्षित राठौर ने अपने पुराने काम से हटकर वेंटिलेटर बनाने का फैसला किया, जबकि उन्होंने पहले इस क्षेत्र में काम नहीं किया था. केवल 90 दिनों के अंदर उन्होंने एक उच्च स्तरीय आईसीयू वेंटिलेटर का निर्माण किया, जिसका उपयोग देश भर के अस्पतालों में किया गया. कैसे यहां पर तक पहुंच गई जर्नी निखिल कुरेले का यह सफर मध्य प्रदेश के शहडोल से शुरू हुआ. वह खुद को एक सामान्य छात्र बताते थे लेकिन मैथ में उनकी पकड़ बहुत अच्छी थी. उन्होंने कक्षा 10 में गणित में शानदार प्रदर्शन करते हुए 96% नंबर हासिल किए थे. उनकी प्रतिभा को देखते हुए माता-पिता ने उन्हें इंजीनियरिंग की तैयारी के लिए कोटा भेजा. निखिल ने जेईई परीक्षा पास कर 2012 में आईआईटी कानपुर में मैकेनिकल इंजीनियरिंग में एडमिशन लिया. कॉलेज के दौरान वह रोबोटिक्स क्लब से जुड़े और मशीनों के जरिए आम लोगों के बीच आ रही परेशानियों का समाधान करने में उनकी रुचि बढ़ी. साल 2016 में ग्रेजुएशन की डिग्री लेने के बाद उन्होंने बजाज ऑटो में नौकरी की, लेकिन हमेशा से उनका लक्ष्य अपना बिजनेस शुरू करना था. वहीं, हर्षित राठौर ने केंद्रीय विद्यालय से पढ़ाई की है. उन्होंने 2016 में आईआईटी कानपुर से केमिस्ट्री में ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की है. ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने टाटा मोटर्स में समर इंटर्नशिप पूरी की और फिर 2016 से 2017 तक नॉक्स इनोवेशन्स एलएलपी में मैकेनिकल डिजाइन इंजीनियर के रूप में काम किया. इस स्टार्टअप की दिशा में सबसे बड़ा बदलाव तब हुआ जब साल 2017 में निखिल कुरेले और उनके आईआईटी कानपुर के साथी हर्षित राठौर ने नौकरी छोड़कर नोक्का रोबोटिक्स की शुरुआत की. उनकी कंपनी ने ऐसा रोबोट बनाया जो बिना पानी के सोलर पैनलों की सफाई करता था और बड़े सोलर प्लांट की कार्यक्षमता बढ़ाने में मदद करता था. साल 2020 तक उनका कारोबार अच्छा चल रहा था लेकिन इस दौरान ही कोविड-19 महामारी आ गया. इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समाधान खोजने के लिए एक चैलेंज शुरू किया. आईआईटी कानपुर के इनक्यूबेशन सेंटर ने स्टार्टअप्स से कोरोना से निपटने के लिए नए विचार मांगे. निखिल और हर्षित ने मेडिकल उपकरणों का अनुभव न होने के बावजूद वेंटिलेटर बनाने का फैसला किया. हर्षित ने बताया कि उन्होंने पहले कभी वेंटिलेटर नहीं देखा था, लेकिन उन्होंने इसे बनाने का तरीका सीखा, जल्दी से एक शुरुआती मॉडल तैयार किया और डॉक्टरों से सुझाव लेकर आगे बढ़े. यह काम आगे बढ़कर आईआईटी कानपुर वेंटिलेटर कंसोर्टियम में बदल गया, जिसमें डॉक्टर, वैज्ञानिक, इंजीनियर और अनुभवी सलाहकार शामिल हुए. टीम ने आईआईटी कानपुर की लैब और तकनीकी सुविधाओं की मदद से वेंटिलेटर के डिजाइन को बेहतर बनाया. करीब तीन महीने की मेहनत के बाद उन्होंने नोक्कार्क वी310 वेंटिलेटर तैयार किया. यह एक आधुनिक आईसीयू वेंटिलेटर था, जिसे ज्यादातर भारतीय उपकरणों और तकनीक से बनाया गया था. यह वेंटिलेटर विदेशी मशीनों की तुलना में कम कीमत पर उपलब्ध था और इसमें गंभीर मरीजों के इलाज के लिए जरूरी सुविधाएं थीं. कोरोना की दूसरी लहर के दौरान जब अस्पतालों में वेंटिलेटर की मांग बहुत बढ़ गई थी, तब इन वेंटिलेटरों ने मरीजों के इलाज में मदद की. इस आपातकालीन प्रोजेक्ट ने कंपनी की दिशा को ही बदल दी. नोक्का रोबोटिक्स का नाम बदलकर नोक्कार्क रोबोटिक्स कर दिया गया और कंपनी ने औद्योगिक रोबोटिक्स की जगह मेडिकल टेक्नोलॉजी पर ध्यान देना शुरू किया. आज कंपनी में 50 से ज्यादा लोग काम कर रहे हैं. कंपनी ने देशभर के अस्पतालों को करीब 260 आईसीयू वेंटिलेटर उपलब्ध कराए हैं और अब यह एक सफल व्यवसाय बन चुकी है. इसके मेडिकल उपकरण अब भारत के बाजार में बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को भी टक्कर दे रहे हैं. निखिल कुरेले के इस काम को पहचान मिली और उन्हें फोर्ब्स 30 अंडर 30 सूची में भी शामिल किया गया. नोक्कार्क की ये सफर दिखाता है कि इंजीनियरिंग स्किल को वास्तविक दुनिया की समस्याओं को हल करने के लिए कितनी जल्दी अनुकूलित किया जा सकता है. संस्थापकों को स्वास्थ्य क्षेत्र का पहले से कोई अनुभव नहीं था लेकिन फिर भी उन्होंने सीखने, डॉक्टरों के साथ मिलकर काम करने और देश की जरूरत के हिसाब से अपनी कंपनी की दिशा बदलने का फैसला किया. आज उनका स्टार्टअप सिर्फ सोलर पैनल साफ करने वाले रोबोट के लिए नहीं जाना जाता, बल्कि इस बात के लिए भी पहचाना जाता है कि भारतीय इंजीनियर मुश्किल समय में विश्वस्तरीय मेडिकल तकनीक बना सकते हैं.
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Aug 5, 2026, 03:55 AM
भारत ने विश्वविद्यालय केंद्र योजना की स्थापना के लिए 100 करोड़ रुपये आवंटित किए

भारत ने विश्वविद्यालय केंद्र योजना की स्थापना के लिए 100 करोड़ रुपये आवंटित किए

इस योजना पर तीन वर्ष में करीब 387.5 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। वित्तीय वर्ष 2026-27 में 100 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान किया गया है। इसमें 70 करोड़ रुपये पूंजीगत और 30 करोड़ रुपये परिचालन खर्च के लिए होंगे। यू-हब के पहले चरण में नोएडा और लखनऊ में 25-25 हजार वर्ग फुट क्षेत्र विकसित होगा।विज्ञापनयहां स्टार्टअप के लिए साझा कार्यस्थल, प्रोटोटाइप सुविधाएं और निवेशकों के लिए स्थान उपलब्ध होंगे। दीर्घकाल में नोएडा में चार लाख वर्ग फुट और लखनऊ में दो लाख वर्ग फुट क्षेत्र में स्थायी परिसर बनेंगे। यू-हब को कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 8 के तहत स्थापित किया जाएगा। इसका संचालन 11 सदस्यीय निदेशक मंडल करेगा, जिसकी अध्यक्षता आईआईटी कानपुर के निदेशक करेंगे। दोनों केंद्रों के लिए एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त होगा।नोएडा केंद्र क्वांटम, उन्नत कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर डिजाइन और ओएसएटी पर केंद्रित होगा। इसमें फिजिकल एआई, रोबोटिक्स, रक्षा तकनीक और उन्नत जैव प्रौद्योगिकी भी शामिल हैं। वहीं, लखनऊ केंद्र एप्लीकेशन आधारित एआई, गवटेक, हेल्थकेयर और इंडस्ट्रियल एआई को बढ़ावा देगा। यह कृषि जैव प्रौद्योगिकी और डायग्नोस्टिक्स से जुड़े स्टार्टअप तथा शोध को भी प्रोत्साहित करेगा। यू-हब का मकसद शोध संस्थानों में विकसित तकनीक को व्यावसायिक उत्पादों में बदलना है। इसके लिए स्टार्टअप, शोध संस्थान, उद्योग, निवेशक और नीति निर्माता एक मंच पर लाए जाएंगे। डीप-टेक स्टार्टअप को विश्वस्तरीय सुविधाएं, पूंजी तक पहुंच और रणनीतिक साझेदारी उपलब्ध कराई जाएगी। इससे उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार पैदा होने, निवेश बढ़ने और स्टार्टअप के सफल होने की दर में वृद्धि की उम्मीद है।
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Aug 5, 2026, 01:40 AM
सौर पैनल रात में क्यों चार्ज नहीं होते हैं

सौर पैनल रात में क्यों चार्ज नहीं होते हैं

हम सबने सोलर पैनल को छतों पर लगा हुआ देखा है. यह दिन में सूरज की रोशनी से बिजली बनाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर अगर आप रात में टार्च की रोशनी सोलर पैनल पर डालें, तो वह चार्ज होता है या नहीं. इसका जवाब है नहीं, टार्च की रोशनी से सोलर पैनल चार्ज नहीं होता है. लेकिन ऐसा होता क्यों है? यह सवाल सुनने में आसान लगता है, लेकिन इसका जवाब विज्ञान की एक खास बात से जुड़ा है. आइए जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी. सबसे पहले ये बात जानना जरूरी है कि आखिर सोलर पैनल काम कैसे करता है, ऐसे में आपको बता दें कि सोलर पैनल के अंदर छोटे-छोटे हिस्से होते हैं जिन्हें सोलर सेल कहते हैं. ये सेल जिस खास पदार्थ से बने होते हैं उसका नाम सिलिकॉन होता है. जब सूरज की रोशनी इन सेल पर पड़ती है तो रोशनी के छोटे-छोटे कण, जिन्हें फोटॉन कहते हैं, सिलिकॉन के अंदर के इलेक्ट्रॉन से टकराते हैं. इस टक्कर से इलेक्ट्रॉन अपनी जगह से हटकर बहने लगते हैं, और यही बहाव बिजली बनाता है. लेकिन इलेक्ट्रॉन को हटाने के लिए फोटॉन के पास एक तय मात्रा में ऊर्जा होनी चाहिए. सूरज की रोशनी में यह ऊर्जा भरपूर मात्रा में होती है, क्योंकि सूरज बहुत तेज और शक्तिशाली रोशनी देता है. यही वजह है कि सोलर पैनल दिन में अच्छी तरह और ज्यादा मात्रा में बिजली बनाता है. इस जानकारी के बाद ये सवाल आता है कि आखिर टार्च की रोशनी में क्या कमी है. ऐसे में आपको बता दें कि टार्च की रोशनी भी दिखने में उजाला ही लगती है, लेकिन इसकी ऊर्जा सूरज की रोशनी से बहुत कम होती है. टार्च एक छोटी बैटरी से चलती है, और वे बहुत कम ऊर्जा वाली रोशनी छोड़ता है. जब यह कमजोर रोशनी सोलर पैनल पर पड़ती है, तो उसमें इतनी ताकत नहीं होती कि वह सिलिकॉन के इलेक्ट्रॉन को ठीक से हटा सके. इसके अलावा टार्च की रोशनी पूरी तरह से सोलर पैनल पर फैल भी नहीं पाती है, जबकि सूरज की रोशनी पूरे पैनल पर एक साथ फैलती है. इसलिए टार्च से सोलर पैनल इतना कमजोर चार्ज होता है कि वह लगभग न के बराबर होता है.
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Aug 4, 2026, 11:39 PM
भारतीय शोधकर्ता ने सतत खेती के लिए नवीन कीटनाशक प्रौद्योगिकी विकसित की

भारतीय शोधकर्ता ने सतत खेती के लिए नवीन कीटनाशक प्रौद्योगिकी विकसित की

रोहतक। अगर किसान को यह पहले ही पता चल जाए कि फसल में कीटनाशक का असर अभी बाकी है या खत्म हो चुका है, तो वह बेवजह दोबारा दवा का छिड़काव नहीं करेगा। इससे उसकी लागत भी बचेगी और फसल, मिट्टी व पर्यावरण पर भीकम असर पड़ेगा।इसी सोच को नई तकनीक में बदलते हुए महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय (एमडीयू) के बॉटनी विभाग की शोधार्थी रहीं ज्योति यादव ने प्रो. विनीता हुड्डा के मार्गदर्शन में दो अहम शोध किए हैं। पहले शोध में नैनो तकनीक आधारित ऐसा मैलाथियॉन विकसित किया गया है जोकम मात्रा में लंबे समय तक असर करता है।विज्ञापनदूसरे शोध में एक स्मार्ट इलेक्ट्रोकेमिकल बायोसेंसर तैयार किया गया है जो महज 10 मिनट में फसल और सब्जियों में बचे मैलाथियॉन की मात्रा बता सकता है।दोनों शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में प्रकाशितविज्ञापनहुए हैं और इन्हें सुरक्षित व टिकाऊ खेती की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। संवादकम दवा, लंबा असर…किसानों की लागत घटाने की उम्मीदशोध के दौरान सामान्य मैलाथियॉन को बायोडिग्रेडेबल नैनो कणों में तैयार किया गया। इससे कीटनाशक एक साथ खत्म होने के बजाय धीरे-धीरे निकलता है और 6 से 13 दिन तक प्रभावी रहता है। परीक्षणों में सफेद मक्खी जैसे प्रमुख कीटों पर 96 से 98 प्रतिशत तक नियंत्रण मिला। खास बात यह रही कि सामान्य मैलाथियॉन की तुलना मेंकम मात्रा में ही बेहतर परिणाम मिले। साथ ही, पौधों की पत्तियों, जड़ों और तनों पर दुष्प्रभाव भीकम देखा गया। यदि यह तकनीक बड़े स्तर पर अपनाई जाती है तो किसानों कोकम दवा खरीदनी पड़ेगी, बार-बार छिड़काव नहीं करना होगा और दवा, मजदूरी व ईंधन पर होने वाला खर्च भी घट सकता है।अब लैब का लंबा इंतजार नहीं, 10 मिनट में मिलेगी रिपोर्टफसल में कीटनाशक का अवशेष जांचने के लिएअब लंबी प्रक्रिया से गुजरने की जरूरत नहीं रहेगी। शोध में विकसित स्मार्ट इलेक्ट्रोकेमिकल बायोसेंसर केवल 10 मिनट में यह बता देता है कि फसल या सब्जी में मैलाथियॉन कितना बचा है। इसकी संवेदनशीलता 0.01 पीपीएम तक है, यानी बहुतकम मात्रा का भी पता लगा सकता है। वास्तविक सब्जियों के नमूनों पर परीक्षण में इसने 93 से 99 प्रतिशत तक सटीक परिणाम दिए। इससे किसानों के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा एजेंसियों और कृषि प्रयोगशालाओं को भी तेजी से जांच करने में मदद मिल सकेगी।दोनों शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशितनैनो मैलाथियॉन पर आधारित शोध विले की पॉलीमर्स फॉर एडवांस्ड टेक्नोलॉजीज और स्मार्ट बायोसेंसर पर शोध एल्सवियर की प्रोसेस बायोकेमिस्ट्री में प्रकाशितहुआ है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक भविष्य मेंकम लागत, बेहतर उत्पादन, सुरक्षित खाद्य गुणवत्ता और पर्यावरण अनुकूल खेती को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
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Aug 4, 2026, 09:44 PM
उत्तर प्रदेश ने प्रौद्योगिकी आधारित परीक्षा पहल की शुरुआत की

उत्तर प्रदेश ने प्रौद्योगिकी आधारित परीक्षा पहल की शुरुआत की

राज्यपाल सचिवालय, उत्तर प्रदेश के निर्देशों और कुलपति प्रो. नरेंद्र बहादुर सिंह के मार्गदर्शन में शुरू की गई इस पहल का मकसद परीक्षा प्रक्रिया को पूरी तरह तकनीक आधारित बनाना है, जिससे प्रश्नपत्रों की गोपनीयता बनी रहे। परीक्षा संचालन अधिक पारदर्शी हो और विद्यार्थियों को समयबद्ध परीक्षा परिणाम उपलब्ध कराए जा सकें।विज्ञापनविश्वविद्यालय द्वारा गठित समिति की संस्तुतियों के आधार पर संभावित परीक्षा केंद्रों पर ऑनलाइन प्रश्नपत्र प्रेषण, डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली, सीसीटीवी निगरानी और बायोमीट्रिक उपस्थिति व्यवस्था लागू करने की संभावनाओं का परीक्षण किया जाएगा। इसके लिए सभी संबद्ध महाविद्यालयों से विस्तृत प्रतिवेदन मांगा गया है।विज्ञापनमीडिया प्रभारी गगन प्रताप सिंह ने बताया कि विश्वविद्यालय ने महाविद्यालयों से विशेष रूप से वित्तीय व्यवहार्यता, तकनीकी व्यवहार्यता और परिचालन व्यवहार्यता पर अपनी आख्या देने को कहा है।
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Aug 4, 2026, 09:04 PM
आइ. पी. एल. चीनी मिल गड्ढे में ऊतक संवर्धन गन्ना खेती के लिए प्रयोगशाला सुविधाएं विकसित की जाएंगी

आइ. पी. एल. चीनी मिल गड्ढे में ऊतक संवर्धन गन्ना खेती के लिए प्रयोगशाला सुविधाएं विकसित की जाएंगी

आईपीएल चीनी मिल खड्डा के प्रधान प्रबंधक एनपी सिंह ने बताया कि मिल परिसर में प्रयोगशाला और अन्य आवश्यक सुविधाएं विकसित की जाएंगी। इसके लिए विशेषज्ञ संस्था से संपर्क किया गया है। जल्द ही परियोजना की विस्तृत रूपरेखा तैयार कर कार्य शुरू कराया जाएगा। उन्होंने बताया कि टिशू कल्चर तकनीक से तैयार पौधों में रोग और वायरस का खतरा बेहद कम होता है। क्षेत्र की मिट्टी और जलवायु के अनुसार उपयुक्त गन्ना प्रजातियों का चयन कर किसानों को उपलब्ध कराया जाएगा। इससे उत्पादन बढ़ने के साथ चीनी रिकवरी में भी सुधार होगा।विज्ञापन-किसानों को मिलेंगे नए और स्वस्थ गन्ना के पौधेटिशू कल्चर तकनीक में सबसे पहले गन्ने के स्वस्थ और श्रेष्ठ पौधे के एक छोटे हिस्से को प्रयोगशाला में सुरक्षित वातावरण में विकसित किया जाता है। वहां से हजारों रोगमुक्त पौधे तैयार किए जाते हैं। इसके बाद इन पौधों को नर्सरी में बढ़ाया जाता है और पूरी तरह तैयार होने पर किसानों को बीज के रूप में उपलब्ध कराया जाता है। इस प्रक्रिया से तैयार पौधों में रोग लगने की संभावना कम होती है और उनकी बढ़वार भी बेहतर होती है। विशेषज्ञों के अनुसार, एक स्वस्थ मूल पौधे से कम समय में बड़ी संख्या में गुणवत्तापूर्ण पौधे तैयार किए जा सकते हैं। परियोजना शुरू होने के बाद खड्डा क्षेत्र के किसानों को नई एवं उन्नत गन्ना प्रजातियां स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होंगी। उन्हें बाहर से बीज मंगाने की जरूरत कम पड़ेगी और बेहतर उत्पादन के जरिए आय बढ़ाने में मदद मिलेगी। क्षेत्र के गन्ना विकास और चीनी उद्योग के लिए इसे महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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Aug 4, 2026, 06:36 PM
एड मेडिकल कॉलेज ने दंत प्रत्यारोपण के दौरान सटीक हड्डी ड्रिलिंग के लिए उपकरण विकसित किया

एड मेडिकल कॉलेज ने दंत प्रत्यारोपण के दौरान सटीक हड्डी ड्रिलिंग के लिए उपकरण विकसित किया

प्राचार्य डॉ. वाणी गुप्ता के मार्गदर्शन में विकसित इस नवाचार का डिजाइन आवेदन संख्या 505018-001 तीन अगस्त 2026 को प्रकाशित हुआ। यह डिवाइस डेंटल इम्प्लांट के दौरान हड्डी की ड्रिलिंग की निर्धारित गहराई सुनिश्चित करने में सहायक होगी। इससे चिकित्सक तय सीमा तक ही ड्रिलिंग कर सकेंगे, जिससे उपचार अधिक सुरक्षित, सटीक और प्रभावी होने के साथ अनावश्यक ड्रिलिंग से होने वाली संभावित जटिलताएं भी कम होंगी।विज्ञापनमेडिकल कॉलेज प्रशासन के अनुसार यह नवाचार दंत चिकित्सा में अनुसंधान और आधुनिक तकनीक को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। भविष्य में इससे मरीजों के उपचार की गुणवत्ता बेहतर होने के साथ चिकित्सकों को भी सुविधा मिलेगी।विज्ञापनप्राचार्य डॉ. वाणी गुप्ता ने कहा कि यह उपलब्धि संस्थान के साथ भारतीय दंत चिकित्सा के क्षेत्र में नवाचार कर रहे शोधकर्ताओं और युवा वैज्ञानिकों के लिए भी प्रेरणादायक है। मेडिकल कॉलेज में अनुसंधान और नवाचार को लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि नई तकनीकों के माध्यम से मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें।
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Aug 4, 2026, 01:48 PM
हरियाणा के जे. सी. बोस विश्वविद्यालय ने त्वरित परिणामों के लिए डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली शुरू की

हरियाणा के जे. सी. बोस विश्वविद्यालय ने त्वरित परिणामों के लिए डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली शुरू की

- विद्यार्थी ऑनलाइन देख सकेंगे अपनी कॉपीअमर उजाला ब्यूरोचंडीगढ़। जेसी बोस विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय वाईएमसीए फरीदाबाद ने मई-2026 की परीक्षाओं के परिणाम एक माह के भीतर घोषित कर दिए हैं। यह उपलब्धि डिजिटल ऑन स्क्रीन मूल्यांकन प्रणाली लागू होने से संभव हुई। इसके साथ ही यह विश्वविद्यालय उत्तर पुस्तिकाओं के डिजिटल मूल्यांकन की व्यवस्था शुरू करने वाला हरियाणा का पहला सरकारी विश्वविद्यालय बन गया है।नई प्रणाली के तहत उत्तर पुस्तिकाओं की उच्च गति से स्कैनिंग, सुरक्षित ऑन-स्क्रीन मूल्यांकन, अंकों और ग्रेड की स्वचालित प्रोसेसिंग तथा प्रॉक्टर्ड ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का उपयोग किया गया। इससे मूल्यांकन प्रक्रिया अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और जवाबदेह बनने के साथ परिणाम घोषित करने में लगने वाला समय भी कम हुआ है। इस व्यवस्था की विशेषता यह है कि विद्यार्थी अपने ईआरपी लॉगिन के माध्यम से मूल्यांकित उत्तर पुस्तिका ऑनलाइन देख सकेंगे। यदि किसी प्रश्न का मूल्यांकन नहीं हुआ हो, अंकों के जोड़ में त्रुटि हो या कम अंक दिए गए हों तो छात्र ऑनलाइन आपत्ति भी दर्ज करा सकेंगे। विश्वविद्यालय के अनुसार इस व्यवस्था से उत्तर पुस्तिकाओं से जुड़ी शिकायतों और प्रतियां मांगने वाले आवेदनों में कमी आई है। मई-2026 परीक्षा के दौरान किसी भी उत्तर पुस्तिका के गुम होने या बदलने की शिकायत भी सामने नहीं आई।विज्ञापनचंडीगढ़ में जारी विज्ञप्ति में कुलगुरु प्रो. राजीव कुमार ने कहा कि विश्वविद्यालय ने डिजिटल प्रणाली लागू करने से पहले शिक्षकों को ऑन स्क्रीन मूल्यांकन का प्रशिक्षण भी दिया। तकनीक आधारित यह व्यवस्था परीक्षा प्रणाली को अधिक विश्वसनीय और दक्ष बनाएगी। विश्वविद्यालय अब प्रश्न पत्र तैयार करने और उनकी प्रोसेसिंग में भी डिजिटल तकनीक का उपयोग बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है।
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Aug 4, 2026, 07:04 AM
भारतीय मंत्रिमंडल ने एक्सप्रेस-वे निर्माण और क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण को मंजूरी दी

भारतीय मंत्रिमंडल ने एक्सप्रेस-वे निर्माण और क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण को मंजूरी दी

प्रदेश में कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए कैबिनेट ने जेवर एयरपोर्ट से गंगा एक्सप्रेसवे तक (वाया बुलंदशहर) बनने वाले 74.467 किलोमीटर लंबे, 6-लेन प्रवेश-नियंत्रित ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे के आगणन को अपनी स्वीकृति दे दी है। इस एक्सप्रेसवे को भविष्य की जरूरतों के अनुसार 8-लेन तक विस्तारित किया जा सकेगा। इसके अलावा, प्रयागराज और चित्रकूट क्षेत्र के समन्वित एवं त्वरित विकास के लिए 'प्रयागराज-चित्रकूट क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण' के गठन को हरी झंडी दी गई है। वहीं, प्रदेश के सात प्रमुख स्थानों पर लोक निर्माण विभाग द्वारा भूमि अधिग्रहित कर उसे बहुउद्देशीय हब विकसित करने हेतु आवास एवं शहरी नियोजन विभाग को निःशुल्क हस्तांतरित करने का निर्णय लिया गया है। तकनीकी विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लखनऊ और नोएडा में अत्याधुनिक 'यु-हब स्थापित किए जाएंगे।
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Aug 4, 2026, 06:16 AM
आई. आई. टी. बी. एच. यू. ने संस्थान के संसाधनों पर किए गए अनुसंधान के लिए आई. पी. आर. प्रकोष्ठ के माध्यम से पेटेंट आवेदन अनिवार्य किए

आई. आई. टी. बी. एच. यू. ने संस्थान के संसाधनों पर किए गए अनुसंधान के लिए आई. पी. आर. प्रकोष्ठ के माध्यम से पेटेंट आवेदन अनिवार्य किए

अब बिना आईपीआर सेल की मंजूरी के दाखिल किए गए पेटेंट की 15 दिनों में 15 तरह की जानकारियां देनी होंगी। आईआईटी बीएचयू के अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) कार्यालय की ओर से विभागों और संकायों को अधिसूचना जारी कर गाइडलाइंस का पालन करने को कहा गया है। कहा है कि प्रक्रिया पालन न करने पर आईपीआर नीति के तहत प्रशासनिक कार्रवाई होगी, वहीं पेटेंट विवाद हुआ तो फिर संस्थान उसका जिम्मेदार नहीं होगा।विज्ञापनBHU PG Admission: 85 फीसदी सीटों पर प्रवेश पूरा, अब मॉपअप राउंड की तैयारी; प्रवेश पोर्टल पर मिलेगी जानकारीविज्ञापनइस अधिसूचना में बताया गया है कि संस्थान की आईपीआर नीति और निर्धारित प्रक्रिया के तहत आईआईटी में किए गए शोध या संस्थान के संसाधनों, लैब, फंड या कर्मचारियों की सहायता से तैयार किसी भी आविष्कार से संबंधित सभी पेटेंट आवेदन अब आईपीआर सेल के माध्यम से ही भेजे जाएंगे। आईपीआर सेल की ओर से जांच, प्रक्रिया और स्वीकृति के बाद ही उन्हें पेटेंट कार्यालय में दाखिल किया जा सकेगा।
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Aug 4, 2026, 04:36 AM
वैज्ञानिकों ने हमारे सौर मंडल में चंद्रमा के साथ अद्वितीय त्रिकोणीय क्षुद्रग्रह की खोज की

वैज्ञानिकों ने हमारे सौर मंडल में चंद्रमा के साथ अद्वितीय त्रिकोणीय क्षुद्रग्रह की खोज की

स्पेस साइंस की दुनिया में वैज्ञानिक लगातार नई-नई खोजों में जुटे हैं. अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसे एस्टेरॉयड की पहचान की है, जिसकी बनावट, अब तक के देखे गए अधिकतर ऐस्टेरॉयड्स से अलग है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह हमारे सौर मंडल का पहला ज्ञात त्रिलोबेट यान तीन उभरे हुए हिस्सों वाला ऐस्टेरॉयड हो सकता है. खास बात यह है कि इस एस्टेरॉयड का एक चंद्रमा भी है. यह चंद्रमा इसके चारों ओर परिक्रमा कर रहा है. यह एस्टेरॉयड (44) Nysa है. यह मंगल और बृहस्पति के बीच मेन एस्टेरॉयड बेल्ट में सूर्य की परिक्रमा कर रहा है. इस ऐस्टेरॉयड की नई तस्वीरें चिली में लगे वेरी लार्ज टेलिस्कोप और अमेरिका के एरिजोना में लगे लार्ज बाइनोकुलर टेलीस्कोप की मदद से ली गई हैं. Nysa की खोज सबसे पहले साल 1857 में हुई थी, लेकिन उस वक्त टेक्नोलॉजी इतनी एडवांस नहीं थी कि इस एस्टेरॉयड की असली बनावट को समझा जा सके. अब सामने आई नई तस्वीरों से पता चला है कि यह एस्टेरॉयड लगभग 75 किलोमीटर चौड़ा है. इसकी आकृति तीन जुड़े हुए उभारों जैसी दिखाई देती है. इसकी बीच की दो पतली 'गर्दन' इसे अनोखा त्रिलोब वाला आकार देती हैं. यह आकार ही इसे दूसरे एस्टेरॉयड से अलग बनाता है. वैज्ञानिकों ने इसके एक किलोमीटर चौड़े चंद्रमा की भी गुत्थी सुलझा ली है. इस छोटे से चंद्रमा का नाम S/2026 (44) 1 है. यह करीब 170 किलोमीटर की दूरी से इस एस्टेरॉयड के चक्कर लगा रहा है. वैज्ञानिकों के लिए यह खोज इसलिए भी खास है क्योंकि अब तक देखे गए अधिकतर एस्टेरॉयड गोल या अंडाकार रहे हैं, लेकिन इस एस्टेरॉयड की संरचना काफी अलग है. लोवेल ऑब्जर्वेटरी के एस्ट्रोनॉमर केट मिंकर के मुताबिक, इस एस्टेरॉयड के आकार के पीछे सभी बड़ी संभावना यह हो सकती है कि यह आपस में जुड़े हुए पिंडों से बना हुआ एक कॉन्टैक्ट ट्रिपल हो. दूसरी थ्योरी के मुताबिक, यह एक ही ठोस लेकिन अनोखे आकार वाला एस्टेरॉयड हो. वैज्ञानिकों का मानना है कि नायसा जैसे एस्टेरॉयड की स्टडी से हमारे सौर मंडल के शुरुआती इतिहास के बारे में समझने में मदद मिल सकती है. वैज्ञानिक उस कैटिगरी के एस्टेरॉयड में इसे शामिल मान रहे हैं, जिनका निर्माण सौर मंडल के अंदरूनी हिस्से के पास हुआ था. ऐसे में इस एस्टेरॉयड की संरचना उन चट्टानी पदार्थों की जानकारी दे सकती है, जिनसे अरबों साल पहले बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल जैसे ग्रहों का निर्माण हुआ था. इसके साथ ही इस एस्टेरॉयड की अनोखी बनावट यह समझने में भी मदद कर सकती है कि छोटे-छोटे पिंड आपस में जुड़कर कैसे समय के साथ बड़े पिंडों का आकार ले लेते हैं.
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Aug 4, 2026, 04:03 AM
जिला पंचायत ने वर्षा जल के संरक्षण और जल स्रोतों की सुरक्षा के लिए रेत फिल्टर निर्माण को मंजूरी दी

जिला पंचायत ने वर्षा जल के संरक्षण और जल स्रोतों की सुरक्षा के लिए रेत फिल्टर निर्माण को मंजूरी दी

यह पहल वर्षा जल के वैज्ञानिक प्रबंधन, जल स्रोतों की गुणवत्ता बनाए रखने तथा भू-जल पुनर्भरण को सुदृढ़ करने की दिशा में एक प्रभावी कदम मानी जा रही है। प्राप्त जानकारी के अनुसार धमतरी विकासखंड में 78, कुरूद विकासखंड में 124, मगरलोड विकासखंड में 48 तथा नगरी विकासखंड में 107 सैंड फिल्टर निर्माण कार्य स्वीकृत किए गए हैं। इन सभी कार्यों का क्रियान्वयन संबंधित ग्राम पंचायतों के माध्यम से निर्धारित समय-सीमा में किया जाएगा, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों को शीघ्र लाभ मिल सके।विज्ञापनमुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत ने बताया कि सैंड फिल्टर जल स्रोतों के संरक्षण की एक वैज्ञानिक एवं प्रभावी तकनीक है। तालाब, कुएं, जलाशय तथा अन्य सामुदायिक जल स्रोतों के समीप सैंड फिल्टर के निर्माण से वर्षा जल के साथ आने वाली मिट्टी, गाद, प्लास्टिक, कचरा तथा अन्य अशुद्धियां प्राकृतिक रूप से छन जाती हैं।विज्ञापनइससे जल स्रोतों में गाद का जमाव कम होता है, जल की गुणवत्ता बनी रहती है तथा भू-जल पुनर्भरण की प्रक्रिया को भी मजबूती मिलती है। उन्होंने बताया कि इस योजना का उद्देश्य केवल जल स्रोतों का संरक्षण करना ही नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षा जल के बेहतर प्रबंधन को सुनिश्चित करते हुए जल उपलब्धता को दीर्घकालिक आधार प्रदान करना भी है।वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा और बढ़ते जल दोहन के कारण भू-जल स्तर में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है।ऐसे परिदृश्य में सैंड फिल्टर वर्षा जल को प्राकृतिक रूप से भूमि में समाहित होने में सहायता करेंगे, जिससे भू-जल पुनर्भरण को बढ़ावा मिलेगा तथा भविष्य में संभावित पेयजल संकट की स्थिति को काफी हद तक कम किया जा सकेगा। जिला प्रशासन ने सभी ग्राम पंचायतों से सैंड फिल्टर निर्माण के साथ-साथ उनके नियमित रखरखाव और स्वच्छता सुनिश्चित करने का भी आग्रह किया है।
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Aug 3, 2026, 10:42 PM
लिंग-वर्गीकृत वीर्य टीके से जिले के किसानों की डेयरी आय में वृद्धि हुई

लिंग-वर्गीकृत वीर्य टीके से जिले के किसानों की डेयरी आय में वृद्धि हुई

इसी बदलती सोच के चलते पशुपालन विभाग की ओर से उपलब्ध कराए जा रहे सेक्स-सॉर्टेड सीमन (विशेष टीके) को जिले में लगातार अच्छा रुझान मिल रहा है। वर्ष 2022 में शुरू की गई इस सुविधा के तहत अब तक जिले में 4,150 डोज उपलब्ध कराई गई हैं।विज्ञापनइनमें से 3,750 डोज का उपयोग किया जा चुका है, जबकि 400 डोज शेष हैं। विभाग के अनुसार यह तकनीक किसानों को डेयरी व्यवसाय की ओर आकर्षित कर रही है और वैज्ञानिक पशुपालन को बढ़ावा दे रही है।विज्ञापनविशेषज्ञों के अनुसार सेक्स-सॉर्टेड सीमन से कृत्रिम गर्भाधान कराने पर सामान्य सीमन की तुलना में मादा बछड़ी के जन्म की संभावना अधिक रहती है। मादा बछड़ी आगे चलकर दूध देने वाली गाय बनती है, जिससे किसानों की आय में वृद्धि होती है। यही कारण है कि डेयरी व्यवसाय से जुड़े किसान इस तकनीक को तेजी से अपना रहे हैं।आधुनिक कृषि उपकरणों के बढ़ते उपयोग से खेती का स्वरूप बदलने के साथ पशुपालन की प्राथमिकताएं भी बदल गई हैं। अब किसानों का ध्यान बेहतर नस्ल, अधिक दुग्ध उत्पादन और स्थायी आय पर केंद्रित है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे जिले में दुग्ध उत्पादन बढ़ने के साथ डेयरी व्यवसाय को भी मजबूती मिलेगी।बढ़ रही लावारिस गोवंश की चुनौतीखेती में बैलों की उपयोगिता घटने का दूसरा पहलू भी सामने आ रहा है। बैलों की आवश्यकता कम होने के कारण बड़ी संख्या में उन्हें लावारिस छोड़ दिया जा रहा है। जिले में वर्तमान में 28 गोशालाओं में करीब 2,300 गोवंश आश्रय लिए हुए हैं, जबकि लगभग 1,200 लावारिस गोवंश अब भी सड़कों और खेतों में घूम रहे हैं। इनमें अधिकांश बैल हैं। इससे किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचने के साथ सड़क दुर्घटनाओं का खतरा भी बना रहता है।पशुपालन विभाग के माध्यम से सेक्स-सॉर्टेड सीमन उपलब्ध कराया जा रहा है। जिले में अब तक 3,750 डोज का उपयोग किया जा चुका है और किसानों का रुझान इस तकनीक की ओर लगातार बढ़ रहा है। डॉ. सुजय शर्मा, उपनिदेशक, पशुपालन विभाग, हमीरपुर
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Aug 3, 2026, 09:29 PM
जलवायु-प्रतिरोधी सब्जियों की किस्में पोषण सुरक्षा के लिए महत्वपूर्णः विशेषज्ञ

जलवायु-प्रतिरोधी सब्जियों की किस्में पोषण सुरक्षा के लिए महत्वपूर्णः विशेषज्ञ

- जम्मू विवि में विशेषज्ञ बोले, शोध और नई तकनीक का फायदा सीधे किसानों तक पहुंचेअमर उजाला ब्यूरोजम्मू। बढ़ता तापमान, अनियमित बारिश और पानी की कमी आने वाले समय में सब्जियों की खेती के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। ऐसे में जलवायु के अनुकूल नई किस्मों, आधुनिक तकनीक और शोध को खेतों तक पहुंचाना ही पोषण सुरक्षा का सबसे प्रभावी रास्ता होगा। यह बात सोमवार को जम्मू विश्वविद्यालय में आयोजित इनोवटॉक्स व्याख्यान में विशेषज्ञों ने कही।इंस्टीट्यूशन इनोवेशन काउंसिल और वनस्पति विज्ञान विभाग के संयुक्त आयोजन में एकेडमी ऑफ इंडियन हॉर्टिकल्चर, बेंगलुरु के अध्यक्ष डॉ. सुरिंदर टिक्कू ने कहा कि सब्जियां संतुलित आहार का अहम हिस्सा हैं और कुपोषण से लड़ने में उनकी बड़ी भूमिका है।विज्ञापनबदलते मौसम को देखते हुए अब ऐसी किस्मों और खेती की तकनीकों को अपनाने की जरूरत है, जो कम पानी और प्रतिकूल मौसम में भी बेहतर उत्पादन दे सकें। डॉ. टिक्कू ने आधुनिक पौध प्रजनन, संरक्षित खेती, सटीक कृषि तथा बेहतर पोषक और कीट प्रबंधन पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि शोध का लाभ तभी मिलेगा, जब नई तकनीक और नई किस्में किसानों तक पहुंचें और उनका उपयोग खेतों में हो।विज्ञापनकार्यक्रम की शुरुआत वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. सुशील वर्मा ने की। उन्होंने जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए नवाचार आधारित कृषि पर जोर दिया। कार्यक्रम में शिक्षक, शोधार्थी और विभिन्न विभागों के विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। व्याख्यान के बाद प्रतिभागियों ने विशेषज्ञों से जलवायु के अनुकूल खेती और पोषण सुरक्षा पर चर्चा की।---
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