आई. आई. टी. जोधपुर ने धुंधली ऐतिहासिक पांडुलिपियों को खोलने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणाली विकसित की
आईआईटी जोधपुर में सहायक प्रोफेसर डॉ. दिनेश मोहन जोशी के नेतृत्व में शोधकर्ताओं की टीम एआई, संगणकीय भाषाविज्ञान और भारतीय ज्ञान परंपरा को एक साथ जोड़कर इस दिशा में नया शोध कर रही है। इसका मुख्य उद्देश्य उन ऐतिहासिक ग्रंथों को पढ़ने और समझने की तकनीक विकसित करना है, जिनके अक्षर धुंधली स्याही, फटे पन्नों और अपूर्ण लिखावट के कारण स्पष्ट नहीं रह गए हैं।विज्ञापनभारत की पांडुलिपि विरासत में खगोल शास्त्र, गणित, दर्शन, चिकित्सा, साहित्य, धातु शास्त्र और वास्तुकला जैसे विषयों का विशाल ज्ञान मौजूद है। हालांकि, इन पांडुलिपियों में धुंधले अक्षर, धब्बे और जटिल हस्तलिखित संरचनाएं शोधकर्ताओं के सामने बड़ी चुनौती पेश करती हैं। पारंपरिक ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन (ओसीआर) तकनीक भी ऐसी ऐतिहासिक पांडुलिपियों को ठीक से पढ़ने और समझने में सक्षम नहीं है।विज्ञापनइसी समस्या का समाधान खोजने के लिए आईआईटी जोधपुर की टीम एक विशेष एआई प्रणाली विकसित कर रही है। यह प्रणाली केवल पांडुलिपियों को डिजिटल रूप में बदलने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि क्षतिग्रस्त सामग्री की गुणवत्ता सुधारने, प्राचीन हस्तलेखन की पहचान करने, भाषाई संरचनाओं को समझने और अनुवाद में भी मदद करेगी। शोधकर्ता इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मूल पांडुलिपि के स्रोत और उसकी प्रामाणिकता को सुरक्षित रखने पर भी विशेष ध्यान दे रहे हैं।इस शोध का एक प्रमुख नवाचार एडैप्टिव एआई ऑर्केस्ट्रेटर प्रणाली है। यह डिजिटल प्लेटफॉर्म के अलग-अलग तकनीकी घटकों के बीच केंद्रीय समन्वय का काम करेगी। इसकी खासियत यह है कि यह हर पांडुलिपि पर एक जैसी प्रक्रिया लागू नहीं करेगी, बल्कि उसकी स्थिति और जरूरत का आकलन करने के बाद सबसे उपयुक्त प्रसंस्करण पद्धति चुनेगी।इस प्रक्रिया की शुरुआत शोधकर्ताओं की ओर से पांडुलिपि की प्राथमिक पहचान और उसकी प्रोफाइलिंग से होगी। इसमें पृष्ठ पर मौजूद संभावित लिपियों, भाषाओं और एक से अधिक लिपियों की मौजूदगी का विश्लेषण किया जाएगा। इसके बाद एआई प्रणाली पांडुलिपि को कई तकनीकी चरणों से गुजारेगी। इनमें गुणवत्ता का आकलन, छवि सुधार, पृष्ठ की संरचना का विश्लेषण, पाठ का विभाजन, हस्तलिखित सामग्री की पहचान और भाषाई प्रसंस्करण शामिल हैं।आईआईटी जोधपुर के शोधकर्ता इस एआई प्लेटफॉर्म को छह प्रमुख भारतीय लिपियों के लिए तैयार कर रहे हैं। इनमें देवनागरी, शारदा, ग्रंथ, नंदिनागरी, मोडी और तुलु-तिगलारी शामिल हैं। इसके साथ ही टीम शास्त्रीय और क्षेत्रीय भाषाओं के प्रमाणित भाषा पैक के माध्यम से बहुभाषीय प्रसंस्करण की सुविधा विकसित करने की योजना पर भी काम कर रही है।इन सभी लिपियों की अपनी अलग-अलग तकनीकी चुनौतियां हैं। देवनागरी लिपि में अक्षरों के ऊपर बनी शिरोरेखा की संरचना को समझना जरूरी है। वहीं, शारदा, ग्रंथ और नंदिनागरी लिपियों में ऐतिहासिक अक्षर रूपों और जटिल संयुक्ताक्षरों की पहचान करना चुनौतीपूर्ण है। मोडी लिपि में प्रवाहमयी हस्तलेखन को समझना पड़ता है, जबकि तुलु-तिगलारी में अक्षरों के संयोजन और पांडुलिपि की संरचना पर विशेष ध्यान देना होता है। इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए शोधकर्ता अलग-अलग लिपियों के लिए विशेष पाठ विभाजन पद्धतियां और पहचान मॉडल विकसित कर रहे हैं, ताकि हर लिपि की विशिष्ट बनावट और लिखने की शैली को बेहतर ढंग से समझा जा सके।ऐतिहासिक ग्रंथों को पढ़ने में केवल अक्षरों की पहचान करना ही पर्याप्त नहीं है। इनमें प्राचीन शब्दावली, वर्तनी के अलग-अलग रूप, विशिष्ट पारिभाषिक शब्द और जटिल व्याकरणिक संरचनाएं भी होती हैं। ऐसे में किसी शब्द का सही अर्थ समझने के लिए उसके संदर्भ और भाषा की संरचना का विश्लेषण करना जरूरी होता है। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए शोधकर्ता एआई प्लेटफॉर्म में पाठ का मानकीकरण, शब्द विभाजन और संदर्भ के आधार पर व्याख्या करने जैसी सुविधाएं जोड़ रहे हैं। इसके अलावा, प्राचीन ग्रंथों की सामग्री को आधुनिक भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी में अनुवाद करने की सुविधा विकसित करने पर भी काम किया जा रहा है। इससे अलग-अलग भाषाओं के जानकारों और शोधकर्ताओं के लिए इन ग्रंथों का अध्ययन आसान हो सकेगा।सहायक प्रोफेसर डॉ. दिनेश मोहन जोशी के अनुसार, भारत की प्राचीन पांडुलिपियों में हजारों वर्षों का असाधारण बौद्धिक ज्ञान सुरक्षित है। हालांकि, भौतिक क्षति और भाषाई जटिलताओं के कारण यह ज्ञान आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाता। इस पहल के जरिये शोधकर्ता एआई तकनीक और पारंपरिक पांडुलिपि अध्ययन को एक साथ ला रहे हैं।इसमें विद्वानों की विशेषज्ञता का भी सहयोग लिया जा रहा है, ताकि प्राचीन ग्रंथों को पढ़ने, समझने और उनकी व्याख्या करने में तकनीक के साथ मानवीय ज्ञान का इस्तेमाल किया जा सके। आईआईटी जोधपुर का यह शोध भारत की प्राचीन ज्ञान संपदा को संरक्षित करने और उसे भविष्य की पीढ़ियों के लिए अधिक सुलभ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है।